Thursday, February 9, 2023

Class 9 Science Chapter 6 Batch Notes NCERT

 9 Class Science Chapter 6 ऊतक Notes NCERT In Hindi Tissues


Textbook                 NCERT


Class                         kass 9


Subjects                    sience


ChapterC                   Chapter 6


Chapter Namei            tissue


CategorylC              Class 9 Science Notes


Mediumi                Hindi



Class 9 Science Chapter 6 ऊतक Notes In

हिंदी में हम पादप ऊतक, विभज्योतक,


स्थायी ऊतक, सरल स्थायी ऊतक, जटिल स्थायी ऊतक, जंतु ऊतक, ऐपिथीलियमी ऊतक, संयोजी ऊतक पेशीय ऊतक, तंत्रिका ऊतक आदि के बारे में ,


पड़ेंगे ।

Class 9 Science Chapter 6 Tissues Notes In Hindi 

                       Chapter = 6 t issue


* * अध्याय एक नजर में :-


* अध्याय एक नजर में :-

    . ऊतकपा

      पादप ऊतक


   0 जन्तु ऊतक

      पादप ऊतक

      विभज्योतक


• प्राथमिक विभज्योतक

  •  शीर्षस्थ विज्योतक
  •  पाश्र्वय विभज्योतक■
  •  अंतरविष्ट विभज्योत



■स्थायी ऊतक


■ सरल स्थायी घाव

  •    एपीडर्मिस
  •    पैरेनकाइमा
  •    स्केलेरेनकाइमा

जटिल स्थायी ऊतक

  • ■ जाइलम
  •   फ्लोएम

* ऊतक :-


• एक कोशिकाओं का समूह जो उद्भव व कार्य की दृष्टि ससमान होता है उसे ऊतक कहते है । एक कोशिकीय जीवों में सामान्यः एक ही कोशिका के अन्दर सभी महत्वपूर्ण क्रियाएँ जैसे :- पाचन, श्वसन व उत्सर्जन क्रियाएँ होती हैं ।

• बहुकोशिकीय जीवों में सभी महत्वपूर्ण कार्य कोशिकाओं के विभिन्न समूहों द्वारा की जाती है । कोशिकाओं का विशेष समूह जो संरचनात्मक कार्यात्मक व उत्पत्ति में समान होते हैं, ऊतक कहलाते

हैं ।

जन्तु ऊतक

 पादप ऊतक

* पादप ऊतक :-


• कोशिकाओं का ऐसा समूह जिसमें समान अथवा असमान कोशिकाएँ उत्पत्ति, कार्य, संरचना में समान होती हैं, पादप ऊतक कहलाती हैं ।

* पादप ऊतक के प्रकार :-

• पादप ऊतक दो प्रकार के होते हैं। :-

  •   विभज्योतकीय ऊऊत

  •  स्थायी ऊतक
* विभज्योति के ऊतक :-

विभज्योतिकी ऊतक वृद्धि करते हुए भागों में पाए जाते हैं जैसे तने व जड़ों के शीर्ष और कैम्बियम |

* विभज्योति के ऊतकों के प्रकार :-

• स्थिति के आधार पर विभज्योतक तीन प्रकार के

होते हैं :

(i) शीर्षस्थ विभज्योतक:- शीर्षस्थ भेद तने व जड़ के ऊपरी पर स्थित होता है और पादपो की रोशनी वृद्धि करता है।

(ii) पार्श्वीय विभज्योतक :- पार्वीय

विभज्योतक या कैम्बियम तने व जड़ की परिधि में स्थित होता है और उनकी मोटाई में वृद्धि करता है ।

(iii) अंतर्विष्ट विभज्योतक :- अंतर्विष्ट

विभज्योतक पत्तियों के आधार या टहनियों के पर्व के दोनों ओर स्थित होता है। यह इन भागों की वृद्धि करता है ।

* विभज्योति के ऊतकों की विशेषताएं :

  • सेलुलोज की बनी कोषिका भित्ति

  • कोशिकाओं के बीच में स्थान अनुपस्थित, सटकर जुड़ी कोशिकाएँ

  • कोशिकाएँ गोल, अंडाकार या आयताकार

  • कोशिका द्रव्य सघन ( गाढ़ा), काफी मात्रा में,

  • नाभिक, एक व बड़ा

  • • संचित भोजन अनुपस्थित

* विभज्योति के ऊतकों के कार्य :-


• लगातार विभाजित होकर नई कोशिकाएँ पैदा करना और पादपों की लम्बाई और चौड़ाई में वृद्धि करना है ।

* विभेदीकरण :-


• एक सरल कोशिका एक विशिष्ट कार्य करने के लिए स्थायीरुप और आकार प्राप्त करती है उसे विभेदीकरण कहते है ।

* स्थायी ऊतक :-


• ये उन विभज्योतिकी ऊतक से उत्पन्न होते हैं जो कि लगातार विभाजित होकर विभाजन की क्षमता खो देते हैं ।

• इनका आकार, आकृति व मोटाई निश्चित होती है

। ये जीवित या मृत दोनों हो सकते हैं। स्थायी ऊतक की कोशिकाओं के कोशिका द्रव्य में रिक्तिकाएँ होती हैं



(i) सरल ऊतक :-

• यह केवल एक ही प्रकार की कोशिकाओं का समूह

होता है ।

• ये दो प्रकार के होते :

(a) संरक्षी ऊतक

• (b ) सहायक ऊतक

* (a) संरक्षी ऊतक :-


• संरक्षी ऊतक का मुख्य कार्य सुरक्षा करना होता है मैं

* एपीडर्मिस


• पौधे के सभी भाग जैसे पत्तियाँ, फूल, जड़ व तने की सबसे बाहरी परत कहलाती है। यह क्यूटिकल से ढकी होती है, क्यूटिन एक मोम जैसा जल प्रतिरोधी पदार्थ होता है जो कि एपीडर्मिस कोशिकाओं द्वारा स्रावित किया जाता है। अधिकतर पौधों में Epidermis के साथ - साथ पत्तियों पर सूक्ष्म छिद्र रंध्र स्टोमेटा भी पाए जाते हैं। स्टोमेटा में दो गार्ड कोशिकाएँ पाई जाती ह

एपीडर्मिस का कार्य :-


पौधे को सुरक्षा प्रदान करना ।

एपीडर्मिस की क्युटिकल वाष्पोत्सर्जन को रोकती है जिससे पौधा झुलसने से बच जाता है ।

स्टोमेटा द्वारा गैसों के आदान वाष्पोत्सर्जन में सहायक । प्रदान में सहायता व

* कार्क :-


• पौधे की लगातार वृद्धि के कारण जड़ व तने की परिधि में उपस्थित ऊतक कार्क में बदल जाती है । इन कोशिकाओं की भित्ति सुबेरिन के जमाव के कारण मोटी हो जाती है, कार्क कोशिकाएँ जल व गैस दोनों के प्रवाह को रोक देती है ।

* कार्क का कार्य :-

कार्क, झटकों व चोट से पौधे को बचाता है । यह बहुत हल्का, जलरोधक, संपीडित होता है । कार्क का उपयोग कुचालक व झटके सहने वाले पदार्थ के रूप में किया जाता है ।

स्टोमेटा :-


• पत्तियों की एपीडर्मिस में बहुत से सूक्ष्मदर्शीय छिद्र होते हैं जो कि वृक्क के आकार की गार्ड कोशिकाओं से घिरी होती है । ये स्टोमेटा कहलाते हैं ।

* स्टोमेटा का कार्य :-


• कार्बन डाई ऑक्साइड (CO ) व ऑक्सीजन ( O2 ) का आदान प्रदान व जल का वाष्परूप में ह्यस ।

* (ii) सहायक ऊतक :-

• ये तीन प्रकार के होते हैं :-

• (i) पैरेन्काइमा

• (ii) कोलेन्काइमा

• (iii) स्कलेरेन्काइमा

* (i) पैरेन्काइमा की विशेषताए :-


★ इन्हें पैकिंग ऊतक कहा जाता है ।

• समान व्यास वाली जीवित कोशिकाएँ

गोल, अण्डाकार, बहुभुजीय या लम्बी

कोशिका भित्ति पतली व कोशिका द्रव्य सघन

कोशिका के मध्य में केन्द्रीय रिक्तिका

स्थिति :- पौधे के सभी भागों में उपस्थित (जड़,

तना, पत्ती, फूल )

पैरेकाइमा ऊतक के कार्य :-


भोजन को संचित कर इक्ट्ठा करना

• यान्त्रिक मजबूती प्रदान करना

• भोजन को एकत्रित करना

• पौधे के अपशिष्ट पदार्थ गोंद, रेजिन, क्रिस्टल, टेनिन

इकट्ठा करना ।

* (ii) कोलेन्काइमा :-


पैरेन्काइमा के समान जीवित कोशिकाएँ, , कुछ क्लोरोफिल युक्त

पतली कोशिका भित्ति

लम्बी, स्थूल, लचीली सेलुलोज व पेक्टिन का कोनों में जमाव

• अंतः कोशिकीय स्थान अनुपस्थित

• बाह्य त्वचा (epidermis ) के नीचे उपस्थित

* (ii) कोलेन्काइमा का कार्य :-


● यांत्रिक शक्ति प्रदान करना व क्लोरोफिल के कारण

शर्करा व स्टार्च का निर्माण करना ।

* (iii) स्कलेरेन्काइमा :-


कोशिकाएं लम्बी संकरी व मोटी (1mm से 550mm

तक )

• अन्तः कोशिकीय स्थान अनुपस्थित

• सामान्यतः दोनों सिरों पर पैनी

• जीवद्रव्य रहित व मृत

• इन कोशिकाओं में स्थित लिग्निन कोशिका भित्ती को मोटा कर देता है।

* (ii) जटिल स्थायी घाव :-


• वे ऊतक जो दो या दो से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं जटिल स्थायी ऊतक कहलाते हैं ।

* जटिल स्थायी ऊतक के प्रकार :-


● ये दो प्रकार के होते हैं:-

• जाइलम

फ्लोएम

• ये दोनों मिलकर संवहन ऊतक बनाते हैं।

* जाइलम :-


यह ऊतक पादपों में मृदा से जल व खनिज का सवहन करता है यह चार प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बना है :-

★ (1) वाहिनिका : काष्ठीय कोशिका भित्ति

एकल कोशिकाएँ, लम्बी नली के रूप में व मतृ

(ii) वाहिका :- एक दूसरे से जुड़ी लम्बी कोशिकाएँ जड़ से जल व खनिजों का पौधे के विभिन्न भागों में संवहन।

(iii) जाइलम पैरेनकाइमा :- पाय संवहन में

सहायक जीवित ऊतक, भोजन को इकट्ठा करने में भी सहायक ।

(iv) जाइलम फाइबर (स्केलेरेनकाइमा ) :-

पौधे को दृढ़ता प्रदान करना (मृत)

फ्लोएम :-


यह ऊतक पादपों में निर्मित भोज्य पदार्थों का संवहन करता है। चार प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बना होता है।

(i) चालनी नलिकाएँ :- लम्बी व छिद्रितभित्ति

वाली नलिकाकार कोशिकाएँ, चालनी प्लेट के छिद्रों

द्वारा अन्य चालनी नलिका कोशिका के सम्पर्क में।

(ii) सहचरी कोशिकाएँ :- विशेष पैरेन्काइमा

कोशिकाएँ, लम्बी, संकरी सघन जीव द्रव्य व बड़े

केन्द्रक वाली ।

(iii) फ्लोएम पैरेनकाइमा :- सरल

पैरेनकाइमा कोशिकाएँ, भोजन का संग्रहण एवं धीमी

गति से उनका संवहन ।

(iv) फ्लोएम रेशे ये स्क्लेरेन्काइमा के रेशे

दृढ़ता प्रदान करते हैं, मृत कोशिकाएँ

* जाइलम एवं फ्लोएम में अन्तर :-

जाइलम :-

• मृत कोशिकाऐ

• कोशिका भित्ति मोटी होती है।

लिग्निन कोशिका भित्ति को मोटी कर देती है।

वाहिनिका और वाहिका पाई जाती है।

कोशिका द्रव्य नहीं होता।

• यह खनिज और जल का संवहन करता है ।

संवहन केवल एक दिशा में होता है।

+ फ्लोएम :-

• जीवित कोशिकाएं

• लिपिक लिप्यंतरण होता है।

• कोशिका भित्ती सल्युलोज की बनी होती है।

• चालनी नलिकाएँ और सहचरी कोशिकाएँ पाई जाती

है। कोशिका द्रव्य होता है।

• यह पादप में निर्मित भोजन का संवहन करता है।। • संवहन ऊपर नीचे दोनों दिशाओं में होता है।

जंतु ऊतक के प्रकार :-


● जंतुओं में ये चार प्रकार के ऊतक पाये जाते हैं :-

• ( संरक्षी ऊतक) एपीथिलियल ऊतक

• पेशीय ऊतक

• तन्त्रिका ऊतक

संयोजी ऊतक

* एपीथिलियल ऊतक (संरक्षी ऊतक ) :-

● जो शरीर की गुहिकाओं के आवरण, त्वचा, मुँह

की बाह्य परत ( अस्तर ) में पाए जाते हैं।

• यह शरीर व शरीर की गुहिकाओं का आवरण बनाता है। मुँह की बाह्य परत पाचन तन्त्र, फेफड़े, त्वचा की संरचना अवशोषण करने वाले भाग व स्राव करने वाले भाग, वृक्कीय नली व लार नली की ग्रन्थि 1

• ये पाँच प्रकार की होती है :-

'साधारण शल्की एपीथिलियम :- पतली एक कोशिकीय स्तर ये सामान्यतः रक्त वाहिकाएँ व फेफड़ों की कूपिकाओं को बनाती है। पारगम्य झिल्ली द्वारा पदार्थों का संवहन

घनाकार एपीथिलियम :- घनाकार एपीथिलियम वृक्क की सतह और वृक्कीय नली व लार ग्रन्थि की नली के अस्तर का निर्माण ।

स्तम्भाकार एपीथिलियम :- ये कोशिकाएँ स्तम्भाकार होती है। ये आंतों की सतह पर पायी जाती है।

ग्रंथिल एपीथिलियम :- ये एपीथिलयम कोशिकाएँ आंतों की सतह, त्वचा में आदि में पाई जाती है व पाचक एन्जाइम व रसों का स्राव करती है।

पक्ष्माभी एपीथिलियम :- कुछ अंगों की कोशिकाओं की सतह पर पक्ष्माभ (धागे जैसी रचना ) पाए जाते हैं जैसे श्वास नली, गर्भ नली, गुर्दे की नालिका । ये उत्तक पदार्थों के चलने में सहायक होते हैं ।

संयोजी ऊतक


• इस ऊतक की कोशिकाएं शरीर के विभिन्न अंगों को आपस में जोड़ने या आधार देने का कार्य करती हैं जो कि मैट्रिक्स में ढीले रूप से पायी जाती हैं।

रक्त एवं लसीका :-

• लाल रक्त कोशिकाएँ, श्वेत रक्त कोशिकाएँ तथा प्लेटलेट्स प्लाज्मा में निलम्बित रहते हैं।

• इसमें प्रोटीन, नमक व हार्मोन भी होते हैं। रक्त पचे हुए भोजन हार्मोन, CO2, 02, शरीर की सुरक्षा व तापमान नियन्त्रण का कार्य करता है। रक्त गैसों, शरीर के पचे हुए भोजन हार्मोन और उत्सर्जी पदार्थों को शरीर के एक भाग से दूसरे भाग में संवहन करता है।

अस्थि:-

• इसके अंतः कोशीय स्थान में Ca व फास्फोरस के लवण भरे होते हैं, जो अस्थि को कठोरता प्रदान करते हैं अस्थियाँ शरीर को निश्चित आकार प्रदान करती हैं। इसका मैट्रिक्स ठोस होता है।

उपास्थि :-

• इसमें अंतः कोशीय स्थान पर प्रोटीन व शर्करा होती है जिससे यह लचीला व मुलायम होता है यह अस्थियों के जोड़ों को चिकना बनाता है। यह नाक, कान, , नाखून आदि में पाई जाती है। इसकी कोशिकाएँ कोन्ड्रोसाइट कहलाती है। कंठ

एरिओलर / ऊत्तक :-

• यह ऊतक त्वचा और मांसपेशियों के बीच रक्त नलिका के चारों ओर तथा नसों और अस्थिमज्जा में पाया जाता है।

• कार्य :- यह अंगों के भीतर की खाली जगह को भरता है। आंतरिक अंगों को सहारा प्रदान करता है और ऊतकों की मरम्मत में सहायता करता है।

वसामय उत्तक :-

• वसा का संग्रह करने वला वसामय ऊतक त्वचा के नीचे आंतरिक अंगों के बीच पाया जाता है। वसा संग्रहित होने के कारण यह ऊष्मीय कुचालक का कार्य भी करता है। इस ऊतक की कोशिकाएं वसा की गोलिकाओं से भरी होती है।

पेशीय ऊतक :-


● शरीर की माँस पेशियों पेशीय ऊतक की बनी होती हैं धागे के तरह की संरचना के कारण ये पेशीय तन्तु कहलाते हैं मांसपेशियों का संकुचन व फैलाव इन्हीं के द्वारा किया जाता है। मांसपेशियों में विशेष प्रकार का प्रोटीन एक्टिन एवं मायोसिन होता है जिन्हें संकुचन प्रोटीन कहते है।

• यह ऊतक तीन प्रकार होते हैं:

• वैज्ञानिक पेशी

. -अरेखित (चिकनी पेशी

• हृदयपेशी

पंजीकृत पेशी :-

• ये पेशी अस्थि में जुड़ी होती है व शारीरिक गति में सहायता करती है।

• लम्बी बेलनाकार तथा अशाखित होती है।

पार्श्व में हल्की व गहरी धारियाँ होती हैं।

बहुनाभिकीय होती है।

• हाथ व पैरों की पेशियाँ

'असंबद्ध पेशी :-

ये आमाश्य, छोटी आंत, मूत्राशय फेफड़ों की श्वसनी में पाई जाती है।

• लम्बी तथा शक्वाकार सिरों (Spindle Shaped) वाली।

. मांसपेशियों में पट्टिकाएँ नहीं होती।

• एक केन्द्रक युक्त • आहार नाल, पेशियाँ हृदय, आँख की पलक, फेफड़ों की

'हृदय पेशी :-

• ये हृदय में पाई जाती हैं।

• नियमित व शाखित

बिना शक्वाकार सिरे वाली तथा हल्के जुड़ाव वाली

• एक केन्द्रक युक्त

तन्त्रिका ऊतक :-


● मस्तिष्क, मेरू रज्जु एवं तन्त्रिकाएँ मिलकर तन्त्रिका तन्त्र बनाती हैं। तन्त्रिका तन्त्र की कोशिकाएँ न्यूरॉन कहलाती हैं। तन्त्रिका कोशिका में केन्द्रक व कोशिका द्रव्य होता है।

तन्त्रिका कोशिका के भाग :-


तन्त्रिका कोशिका के तीन भाग होते हैं :-

प्रवर्ध या डेन्ड्राइट्स:- धागे जैसी रचना जो साइटोन से जुड़ी रहती है।

साइटोन :- कोशिका जैसी संरचना जिसमें केन्द्रक व कोशिका द्रव्य पाया जाता है यह संवेग को विद्युत


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