Tuesday, December 20, 2022

रामायण कथा राम की Ramayan ki katha

रामायण  कथा राम की Ramayan ki katha


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वैसे तो रामायण की कहानी बहुत लम्बी है परन्तु आज हम आपके सामने इस कहानी का एक संक्षिप्त रूप रेखा प्रस्तुत कर रहे हैं। 


रामायण श्री राम की एक अद्भुत अमर कहानी है जो हमें विचारधारा, भक्ति, कर्तव्य, रिश्ते, धर्म, और कर्म को सही मायने में सिखाता है।


 


श्री राम अयोध्या के राजा दशरथ के जेष्ट पुत्र थे और माता सीता उनकी धर्मपत्नी थी। 


राम बहुत ही साहसी, बुद्धिमान और आज्ञाकारी और सीता बहुत ही सुन्दर, उदार और पुण्यात्मा थी। 


माता सीता की मुलाकात श्री राम से उनके स्वयंवर में हुई जो सीता माता के पिता, मिथिला के राजा जनक द्वारा संयोजित किया गया था। 


यह स्वयंवर माता सीता के लिए अच्छे वर की खोज में आयोजित किया गया था।


 


उस आयोजन में कई राज्यों के राजकुमारों और राजाओं को आमंत्रित किया गया था। 


शर्त यह थी की जो कोई भी शिव धनुष को उठा कर धनुष के तार को खीच सकेगा उसी का विवाह सीता से होगा। 


सभी राजाओं ने कोशिश किया परन्तु वे धनुष को हिला भी ना सके। 


जब श्री राम की बारी आई तो श्री राम ने एक ही हाथ से धनुष उठा लिया और जैस ही उसके तार को खीचने की कोशिश की वह धनुष दो टुकड़ों में टूट गया। 


इस प्रकार श्री राम और सीता का मिलन / विवाह हुआ।

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अयोध्या के राजा दशरथ के तीन पत्नियां और चार पुत्र थे। 


राम सभी भाइयों में बड़े थे और उनकी माता का नाम कौशल्या था। 


भरत राजा दशरथ के दूसरी और प्रिय पत्नी कैकेयी के पुत्र थे। दुसरे दो भाई थे, लक्ष्मण और सत्रुघन जिनकी माता का नाम था सुमित्रा।


 


प्रभु राम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। 


अयोध्या के राजा दशरथ की तीन रानियां थीं। किन्तु किसी रानी से संतान की प्राप्ति नही हुई। 


तत्पश्चात, राजा दशरथ ने पुत्र पाने की इच्छा अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ से बताई। म


हर्षि वशिष्ठ ने विचार कर ऋषि श्रृंगी को आमंत्रित किया। ऋषि श्रृंगी ने राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करने का प्रावधान बताया।


 


ऋषि श्रृंगी के निर्देशानुसार राजा दशरथ ने यज्ञ करवाया जब यज्ञ में पूर्णाहुति दी जा रही थी उस समय अग्नि कुण्ड से अग्नि देव मनुष्य रूप में प्रकट हुए तथा अग्नि देव ने राजा दशरथ को खीर से भरा कटोरा प्रदान किया। 


तत्पश्चात ऋषि श्रृंगी ने बताया हे राजन, अग्नि देव द्वारा प्रदान किये गए खीर को अपनी सभी रानियों को प्रसाद रूप में दीजियेगा।


 


राजा दशरथ ने वह खीर अपनी तीनो रानियों कौशल्या, कैकेयी एवम सुमित्रा में बांट दी।


 


प्रसाद ग्रहण के पश्चात निश्चित अवधि में अर्थात चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की नवमी को राजा दशरथ के घर में माता कौशल्या के गर्भ से राम जी का जन्म हुआ तथा कैकेयी के गर्भ से भरत एवं सुमित्रा के गर्भ से लक्ष्मण तथा शत्रुधन का जन्म हुआ। 


राजा दशरथ के घर में चारो राजकुमार एक साथ समान वातावरण में पलने लगे। राम जन्म की ख़ुशी में उसी समय से राम भक्त रामनवमी पर्व मनाते है।


 



 


राम नवमी पौराणिक मान्यताएं Ram Navami Katha 


 


श्री रामनवमी की कहानी लंकाधिराज रावण से शुरू होती है। 


रावण अपने राज्यकाल में बहुत अत्याचार करता था। 


उसके अत्याचार से पूरी जनता त्रस्त थी, यहां तक की देवतागण भी, क्योंकि रावण ने ब्रह्मा जी से अमर होने का वरदान ले लिया था। 


उसके अत्याचार से तंग होकर देवतागण भगवान विष्णु के पास गए और प्रार्थना करने लगे। 


फलस्वरूप प्रतापी राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या की कोख से भगवान विष्णु ने राम के रूप में रावण को परास्त करने हेतु जन्म लिया। 


तब से चैत्र की नवमी तिथि को रामनवमी के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। 


ऐसा भी कहा जाता है कि नवमी के दिन ही स्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना शुरू की थी।


 


पुराणों के मुताबिक राम के जन्म के बारे में भगवान शिव ने मां पार्वती को बताया था वही आज हम आपको बताने जा रहें कि भगवान राम नें जन्म क्यों लिया था। 


एक कहानी है कि ब्रह्मणों के शाप के कारण प्रतापभान, अरिमर्दन और धर्मरूचि यह तीनो रावण ,कुम्भकरण और विभिषन बनें। 


रावण ने अपनी प्रजा पर बहुत अत्याचार किये।


 


एक बार तीनो भाइयों ने घोर तप किया । तप से ब्रह्मा जी ने खुश होकर वर मांगने को कहा। 


इस पर रावण ने कहा कि हे प्रभु हम वानर और इंसान दाे जातियों को छोड़कर और किसी के मारे से न मरे यह वर दीजिए।


शिव जी ने और  ब्रह्म जी ने रावण काे वर दिया ।


 


इसके बाद शिव जी ने और ब्रह्मा जी ने विशालकाय कुम्भकर्ण को देखकर सोचा कि यह अगर रोज भोजन करेगा तो पृथ्वी को नाश हो जायेगा। 


तब मां सरस्वती ने उसकी बुद्धी फेर दी और कुम्भकर्ण नें 6 माह की नींद मांग ली । 


विभीषण ने प्रभु के चारणों में अनन्य और निष्काम प्रेम की अभिलाषा जताई। वर देकर ब्रह्मा जी चले गये। 


 


तुलसीदास जी ने लिखा है कि जब पृथ्वी पर रावण का अत्याचार बढ़ा और धर्म की हानि होने लगी तब भगवान शिव कहते हैं कि –


 


राम जनम के हेतु अनेका । परम विचित्र एक तें एका ।।


जब जब होई धरम की हानि ।  बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ।।


तब तब प्रभु धरि विविध सरीरा।  हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ।।


 


 


यानी जब-जब धर्म का ह्रास होता है और अभिमानी राक्षस प्रवृत्ति के लोग बढ़ने लगते हैं तब तब कृपानिधान प्रभु भांति-भांति के दिव्य शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं। 


वे असुरों को मारकर देवताओं को स्थापित करते हैं। अपने वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं। यही श्रीराम जी के अवतार का सबसे बड़ा कारण है।  


 


जब राम को एक तरफ राज तिलक करने की तैयारी हो रही थी तभी उसकी सौतेली माँ कैकेयी, अपने पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनाने का षड्यंत्र रच रही थी। 


यह षड्यंत्र बूढी मंथरा के द्वारा किया गया था। 


रानी कैकेयी ने एक बार राजा दशरथ की जीवन की रक्षा की थी तब राजा दशरथ ने उन्हें कुछ भी मांगने के लिए पुछा था पर कैकेयी ने कहा समय आने पर मैं मांग लूंगी।


 


उसी वचन के बल पर कैकेयी ने राजा दशरथ से पुत्र भरत के लिए अयोध्या का सिंघासन और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास माँगा। 


श्री राम तो आज्ञाकारी थे इसलिए उन्होंने अपने सौतेली माँ कैकेयी की बातों को आशीर्वाद माना और माता सीता और प्रिय भाई लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष का वनवास व्यतीत करने के लिए राज्य छोड़ कर चले गए।


 


इस असीम दुख को राजा दशरथ सह नहीं पाए और उनकी मृत्यु हो गयी। 


कैकेयी के पुत्र भरत को जब यह बात पता चली तो उसने भी राज गद्दी लेने से इंकार कर दिया।


 


रामायण में चौदह वर्ष का वनवास  Ramayan 14 years of exile 


राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के लिए निकल पड़े। 


रास्ते में उन्होंने कई असुरों का संहार किया और कई पवित्र और अच्छे लोगों से भी वे मिले। 


वे वन चित्रकूट में एक कुटिया बना कर रहने लगे। 


एक बार की बात है लंका के असुर राजा रावन की छोटी बहन सूर्पनखा ने राम को देखा और वह मोहित हो गयी।


 


उसने  राम को पाने की कोशिश की पर राम ने उत्तर दिया – मैं तो विवाहित हूँ मेरे भाई लक्ष्मण से पूछ के देखो। 


तब सूर्पनखा लक्ष्मण के पास जा कर विवाह का प्रस्ताव रखने लगी पर लक्ष्मण ने साफ़ इनकार कर दिया। 


तब सूर्पनखा ने क्रोधित हो कर माता सीता पर आक्रमण कर दिया। 


यह देख कर लक्ष्मण ने चाकू से सूर्पनखा का नाक काट दिया। कटी हुई नाक के साथ रोते हुए जब सूर्पनखा लंका पहुंची तो सारी बातें जान कर रावण को बहुत क्रोध आया। 


उसने बाद रावन ने सीता हरण की योजना बनायीं।


 


रामायण में सीता हरण  Sita Haran katha


योजना के तहत रावन ने मारीच राक्षश को चित्रकूट के कुटिया के पास एक सुन्दर हिरन के रूप में भेजा। 


जब मारीच को माता सीता ने देखा तो उन्होंने श्री राम से उस हिरण को पकड़ के लाने के लिए कहा। 


सीता की बात को मान कर राम उस हिरण को पकड़ने उसके पीछे-पीछे गए और लक्ष्मण को आदेश दिया की वो सीता को छोड़ कर कहीं ना जाए।


बहुत पीछा  करने के बाद राम ने उस हिरण को बाण से मारा। 


जैसे ही राम का बाण हिरण बने मारीच को लगा वह अपने असली राक्षस रूप में आ गया और राम के आवाज़ में सीता और लक्ष्मण को मदद के लिए पुकारने लगा।


 


सीता ने जब राम के आवाज़ में उस राक्षश के विलाप को देखा तो वो घबरा गयी और उसने लक्ष्मण को राम की मदद के लिए वन जाने को कहा। 


लक्ष्मण ने सीता माता के कुटिया को चारों और से “लक्ष्मण रेखा” से सुरक्षित किया और वो श्री राम की खोज करने वन में चले गए।


 


योजना के अनुसार रावण एक साधू के रूप में कुटिया पहुंचा और भिक्षाम देहि का स्वर लगाने लगा। 


जैसे ही रावण ने कुटिया के पास लक्ष्मण रेखा पर अपना पैर रखा उसका पैर जलने लगा यह देखकर रावण ने माता सीता को बाहर आकर भोजन देने के लिए कहा। 


जैसे ही माता सीता लक्ष्मण रेखा से बाहर निकली रावण ने पुष्पक विमान में उनका अपहरण कर लिया।


 


जब राम और लक्ष्मण को यह पता चला की उनके साथ छल हुआ है तो वो कुटिया की और भागे पर वहां उन्हें कोई नहीं मिला। 


जब रावण सीता को पुष्पक विमान में लेकर जा रहा था तब बूढ़े जटायु पक्षी ने रावण से सीता माता को छुड़ाने के लिए युद्ध किया परन्तु रावण ने जटायु का पंख काट डाला। 


जब राम और लक्ष्मण सीता को ढूँढते हुए जा रहे थे तो रास्ते में जटायु का शारीर पड़ा था और वो राम-राम विलाप कर रहा था। 


जब राम और लक्ष्मण ने उनसे सीता के विषय में पुछा तो जटायु ने उन्हें बताया की रावण माता सीता को उठा ले गया है और यह बताते बताते उसकी मृत्यु हो गयी।


 


रामायण में राम और हनुमान का मिलन  Ram and Hanuman  Milan


हनुमान किसकिन्धा के राजा सुग्रीव की वानर सेना के मंत्री थे। 


राम और हनुमान पहली बार रिशिमुख पर्वत पर मिले जहाँ सुग्रीव और उनके साथी रहते थे। 


सुग्रीव के भाई बाली ने उससे उसका राज्य भी छीन लिया और उसकी पत्नी को भी बंदी बना कर रखा था।


 



 


जब सुग्रीव राम से मिले वे दोनों मित्र बन गए। 


जब रावण पुष्पक विमान में सीता माता को ले जा रहा था तब माता सीता ने निशानी के लिए अपने अलंकर फैक दिए थे वो सुग्रीव की सेना के कुछ वानरों को मिला था। 


जब उन्होंने श्री राम को वो अलंकर दिखाये तो राम और लक्ष्मण के आँखों में आंसू आगये।


 


श्री राम ने बाली का वध करके सुग्रीव को किसकिन्धा का राजा दोबारा बना दिया। 


सुग्रीव ने भी मित्रता निभाते हुए राम को वचन दिया की वो और उनकी वानर सेना भी सीता माता को रावन के चंगुल से छुडाने के लिए पूरी जी जान लगा देंगे।


 


 


रामायण में सुग्रीव की वानर सेना


उसके बाद हनुमान, सुग्रीव, जामवंत, ने मिल कर सुग्रीव की वानर सेना का नेतृत्व किया और चारों दिशाओं में अपनी सेना को भेजा। 


सभी दिशाओं में ढूँढने के बाद भी कुछ ना मिलने पर ज्यादातर सेना वापस लौट आये। 


दक्षिण की तरफ हनुमान एक सेना लेकर गए जिसका नेतृत्व अंगद कर रहे थे। 


जब वे दक्षिण के समुंद तट पर पहुंचे तो वे भी उदास होकर विन्द्य पर्वत पर इसके विषय में बात कर रहे थे।


 


वहीँ कोने में एक बड़ा पक्षी बैठा था जिसका नाम था सम्पाती। 


सम्पति वानरों को देखकर बहुत खुश हो गया और भगवान् का शुक्रिया करने लगा इतना सारा भोजन देने के लिए। 


जब सभी वानरों को पता चला की वह उन्हें खाने की कोशिश करने वाला था तो सभी उसकी घोर आलोचना करने लगे और महान पक्षी जटायु का नाम लेकर उसकी वीरता की कहानी सुनाने लगे।


 


जैसे ही जटायु की मृत्यु की बात उसे पता चला वह ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगा। 


उसने वानर सेना को बताया की वो जटायु का भाई है और यह भी बताया की उसने और जटायु ने मिलकर स्वर्ग में जाकर इंद्र को भी युद्ध में हराया था। 


उसने यह भी बताया की सूर्य की तेज़ किरणों से जटायु की रक्षा करते समय उसके सभी पंख भी जल गए और वह उस पर्वत पर गिर गया। 


सम्पाती ने वानरों से बताया कि वह बहुत ज्यादा जगहों पर जा चूका है और उसने यह भी बताया की लंका का असुर राजा रावण ने सीता को अपहरण किया है और उसी दक्षिणी समुद्र के दूसरी ओर उसका राज्य है।


 


रामायण में लंका की ओर हनुमान की समुद्र यात्रा 


जामवंत ने हनुमान के सभी शक्तियों को ध्यान दिलाते हुए कहा की हे हनुमान आप तो महा ज्ञानी, वानरों के स्वामी और पवन पुत्र हैं। 


यह सुन कर हनुमान का मन हर्षित हो गया और वे समुंद्र तट किनारे स्तिथ सभी लोगों से बोले आप सभी कंद मूल खाकर यही मेरा इंतज़ार करें जब तक में सीता माता को देखकर वापस ना लौट आऊं। 


ऐसा कहकर वे समुद्र के ऊपर से उड़ते हुए लंका की ओर चले गए।


 


रास्ते में जाते समय उन्हें सबसे पहले मेनका पर्वत आये। 


उन्होंने हनुमान जी से कुछ देर आराम करने के लिए कहा पर हनुमान ने उत्तर दिया – जब तक में श्री राम जी का कार्य पूर्ण ना कर लूं मेरे जीवन में विश्राम की कोई जगह नहीं है और वे उड़ाते हुए आगे चले गए।


 


देवताओं ने हनुमान की परीक्षा लेने के लिए सापों की माता सुरसा को भेजा। 


सुरसा ने हनुमान को खाने की कोशिश की पर हनुमान को वो खा ना सकी। हनुमान उसके मुख में जा कर दोबारा निकल आये और आगे चले गए।


 


समुंद्र में एक छाया को पकड़ कर खा लेने वाली राक्षसी रहती थी। 


उसने हनुमान को पकड़ लिया पर हनुमान ने उसे भी मार दिया।


 


रामायण में हनुमान लंका दहन की कहानी 


समुद्र तट पर पहुँचने के बाद हनुमान एक पर्वत के ऊपर चढ़ गए और वहां से उन्होंने लंका की और देखा। 


लंका का राज्य उन्हें दिखा जिसके सामने एक बड़ा द्वार था और पूरा लंका सोने का बना हुआ था।


 


हनुमान ने एक छोटे मछर के आकार जितना रूप धारण किया और वो द्वार से अन्दर जाने लगे। उसी द्वार पर लंकिनी नामक राक्षसी रहती थी।  


उसने हनुमान का रास्ता रोका तो हनुमान ने एक ज़ोर का घूँसा दिया तो निचे जा कर गिरी। 


उसने डर के मारे हनुमान को हाथ जोड़ा और लंका के भीतर जाने दिया।


 


हनुमान ने माता सीता को महल के हर जगह ढूँढा पर वह उन्हें नहीं मिली।  


थोड़ी दे बाद ढूँढने के बाद उन्हें एक ऐसा महल दिखाई दिया जिसमें एक छोटा सा मंदिर था एक तुलसी का पौधा भी। 


हनुमान जी को यह देखकर अचंभे में पड गए औए उन्हें यह जानने की इच्छा हुई की आखिर ऐसा कौन है जो इन असुरों के बिच श्री राम का भक्त है। 


यह जानने के लिए हनुमान ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और उन्हें पुकारा। 


विभीषण अपने महल से बाहर निकले और जब उन्होंने हनुमान को देखा तो वो बोले – हे महापुरुष आपको देख कर मेरे मन में अत्यंत सुख मिल रहा है, क्या आप स्वयं श्री राम हैं?


 


हनुमान ने पुछा आप कौन हैं? विभीषण ने उत्तर दिया – मैं रावण का भाई विभीषण हूँ।


 


यह सुन कर हनुमान अपने असली रूप में आगए और श्री रामचन्द्र जी के विषय में सभी बातें उन्हें बताया। 


विभीषण ने निवेदन किया- हे पवनपुत्र मुझे एक बार श्री राम से मिलवा दो। 


हनुमान ने उत्तर दिया – मैं श्री राम जी से ज़रूर मिलवा दूंगा परन्तु पहले मुझे यह बताये की मैं जानकी माता से कैसे मिल सकता हूँ?


 


रामायण में अशोक वाटिका में हनुमान सीता भेंट 


विभीषण ने हनुमान को बताया की रावण ने सीता माता को अशोक वाटिका में कैद करके रखा है। 


यह जानने के बाद हनुमान जी ने एक छोटा सा रूप धारण किया और वह अशोक वाटिका पहुंचे।  


वहां पहुँचने के बाद उन्होंने देखा की रावण अपने दसियों के साथ उसी समय अशोक वाटिका में में पहुंचा और सीता माता को अपने ओर देखने के लिए साम दाम दंड भेद का उपयोग किया पर तब भी सीता जी ने एक बार भी उसकी ओर नहीं देखा। 


रावण ने सभी राक्षसियों को सीता को डराने के लिए कहा।


 


पर त्रिजटा नामक एक राक्षसी ने माता सीता की बहुत मदद और देखभाल की और अन्य राक्षसियों को भी डराया जिससे अन्य सभी राक्षसी भी सीता की देखभाल करने लगे।


 


कुछ देर बाद हनुमान ने सीता जी के सामने श्री राम की अंगूठी डाल दी। 


श्री राम नामसे अंकित अंगूठी देख कर सीता माता के आँखों से ख़ुशी के अंशु निकल पड़े। 


परन्तु सीता माता को संदेह हुआ की कहीं यह रावण की कोई चाल तो नहीं। 


तब सीता माता ने पुकारा की कौन है जो यह अंगूठी ले कर आया है। उसके बाद हनुमान जी प्रकट हुए पर हनुमान जी को देखकर भी सीता माता को विश्वस नहीं हुआ।


 


सके बाद हनुमान जी ने मधुर वचनों के साथ रामचन्द्र के गुणों का वर्णन किया और बताया की वो श्री राम जी के दूत हैं। 


 


श्री राम नवमी, विजय दशमी, सुंदरकांड, रामचरितमानस कथा, हनुमान जन्मोत्सव और अखंड रामायण के पाठ में प्रमुखता से गाये जाने वाला भजन।


 


राम कहानी सुनो रे राम कहानी।


कहत सुनत आवे आँखों में पानी।


श्री राम जय जय राम


 


दशरथ के राज दुलारे, कौशल्या की आँख के तारे।


वे सूर्य वंश के सूरज, वे रघुकुल के उज्जयारे।


राजीव नयन बोलें मधुभरी वाणी।


। राम कहानी सुनो रे राम कहानी…।


 


शिव धनुष भंग प्रभु करके, ले आए सीता वर के।


घर त्याग भये वनवासी, पित की आज्ञा सर धर के।


लखन सिया ले संग, छोड़ी रजधानी।


। राम कहानी सुनो रे राम कहानी…।


 


खल भेष भिक्षु धर के, भिक्षा का आग्रह करके।


उस जनक सुता सीता को, छल बल से ले गया हर के।


बड़ा दुःख पावे राजा राम जी की रानी।


। राम कहानी सुनो रे राम कहानी…।


 


श्री राम ने मोहे पठायो, मैं राम दूत बन आयो।


सीता माँ की सेवा में रघुवर को संदेसा लायो।


और संग लायो, प्रभु मुद्रिका निसानी।


 


राम कहानी सुनो रे राम कहानी।


कहत सुनत आवे आँखों में पानी।


श्री राम जय जय राम


 


 


 


सीता ने व्याकुलता से श्री राम जी का हाल चाल पुछा। हनुमान जी ने उत्तर दिया – हे माते श्री राम जी ठीक हैं और वे आपको बहुत याद करते हैं। 


वे बहुत जल्द ही आपको लेने आयेंगे और में शीघ्र ही आपका सन्देश श्री राम जी के पास पहुंचा दूंगा।


 


तभी हनुमान ने सीता माता से श्री राम जी को दिखने के लिए चिन्ह माँगा तो माता सीता ने हनुमान को अपने कंगन उतार कर दे दिए।


 


रामायण में हनुमान लंका दहन  


हनुमान जी को बहुत भूख लग रहा था तो हनुमान अशोक वाटिका में लगे पेड़ों के फलों को खाने लगे। 


फलों को खाने के साथ-साथ हनुमान उन पेड़ों को तोड़ने लगे तभी रावण के सैनिकों ने हनुमान पर प्रहार किया पर हनुमान ने सबको मार डाला।


 



 


जब रावण को इस बात का परा चला की कोई बन्दर अशोक वाटिका में उत्पात मचा रहा है तो उसने अपने पुत्र अक्षय कुमार को भेजा हनुमान का वध करने के लिए। पर हनुमान जी ने उसे क्षण भर में ऊपर पहुंचा दिया।


 


कुछ देर बाद जब रावण को जब अपने पुत्र की मृत्यु का पता चला वह बहुत ज्यादा क्रोधित हुआ। 


उसके बाद रावण ने अपने  जेष्ट  पुत्र मेघनाद को भेजा। 


हनुमान के साथ मेघनाद का बहुत ज्यादा युद्ध हुआ परकुछ ना कर पाने के बाद मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र चला दिया। 


ब्रह्मास्त्र का सम्मान करते हुए हनुमान स्वयं बंधग बन गए।


 


हनुमान को रावण की सभा में लाया गया। 


रावण हनुमान को देख कर हंसा और फिर क्रोधित हो कर उसने प्रश्न किया – रे वानर, तूने किस कारण अशोक वाटिका को तहस-नहस कर दिया? 


तूने किस कारण से मेरे सैनिकों और पुत्र का वध कर दिया क्या तुझे अपने प्राण जाने का डर नहीं है?


 


यह सुन कर हनुमान ने कहा – हे रावण, जिसने महान शिव धनुष को पल भर में तोड़ डाला, जिसने खर, दूषण, त्रिशिरा और बाली को मार गिराया, जिसकी प्रिय पत्नीका तुमने अपहरण किया, मैं उन्ही का दूत हूँ। 


मुजे भूख लग रहा था इसलिए मैंने फल खाए और तुम्हारे राक्षसों ने मुझे खाने नहीं दिया इसलिए मैंने उन्हें मार डाला। 


अभी भी समय है सीता माता को श्री राम को सौंप दो और क्षमा मांग लो।


 


रावण हनुमान की बता सुन कर हसने लगा और बोला – रे दुष्ट, तेरी मृत्यु तेरे सिर पर है। 


ऐसा कह कर रावण ने अपने मंत्रियों को हनुमान को मार डालने का आदेश दिया। यह सुन कर सभी मंत्री हनुमान को मारने दौड़े। 


तभी विभीषण वहां आ पहुंचे और बोले- रुको, दूत को मारना सही नहीं होगा यह निति के विरुद्ध है। कोई और भयानक दंड देना चाहिए।


 


सभी ने कहा बन्दर का पूंछ उसको सबसे प्यारा होता है क्यों ना तेल में कपडा डूबा कर इसकी पूंछ में बंध कर आग लगा दिया जाये। 


हनुमान की पूंछ पर तेल वाला कपडा बंध कर आग लगा दिया गया। 


जैसे ही पूंछ में आग लगी हनुमान जी बंधन मुक्त हो कर एक छत से दुसरे में कूदते गए और पूरी सोने की लंका में आग लगा के समुद्र की और चले गए और वहां अपनी पूंछ पर लगी आग को बुझा दिया।


 


वहां से सीधे हनुमान जी श्री राम के पास लौटे और वहां उन्होंने श्री राम को सीता माता के विषय में बताया और उनके कंगन भी दिखाए। 


सीता माता के निशानी को देख कर श्री राम भौवुक हो गए।


 


रामायण में सागर पर राम सेतु निर्माण


अब श्री राम और वानर सेना की चिंता का विषय था कैसे पूरी सेना समुद्र के दुसरे और जा सकेंगे। 


श्री राम जी ने समुद्र से निवेदन किया की वे रास्ता दें ताकि उनकी सेना समुद्र पार कर सके। 


परन्तु कई बार कहने पर भी समुद्र ने उनकी बात नहीं मानी तब राम ने लक्ष्मण से धनुष माँगा और अग्नि बाण को समुद्र पर साधा जिससे की पानी सुख जाये और वे आगे बढ़ सकें।


 


जैसे ही श्री राम ने ऐसा किया समुद्र देव डरते हुए प्रकट हुए और श्री राम से माफ़ी मांगी और कहा हे नाथ, ऐसा ना करें आपके इस बाण से मेरे में रहते वाले सभी मछलियाँ और जीवित प्राणी का अंत हो जायेगा। 


श्री राम ने कहा – हे समुद्र देव हमें यह बताएं की मेरी यह विशाल सेना इस समुद्र को कैसे पार कर सकते हैं। 


समुद्र देव ने उत्तर दिया – हे रघुनन्दन राम आपकी सेना में दो वानर हैं नल और नील उनके स्पर्श करके किसी भी बड़े से बड़े चीज को पानी में तैरा सकते हैं। यह कह कर समुद्र देव चले गए।


 


उनकी सलाह के अनुसार नल और नील ने पत्थर पर श्री राम के नाम लिख कर समुद्र में फैंक के देखा तो पत्थर तैरने लगा। 


उसके बाद एक के बाद एक करके नल नील समुद्र में पत्थर को समुद्र में फेंकते रहे और समुद्र के अगले छोर तक पहुच गए।


 


रामायण में लंका में श्री राम की वानर सेना 


श्री राम ने अपनी सेना के साथ समुद्र किनारे डेरा डाला। 


जब इस बात का पता रावण की पत्नी मंदोदरी को पता चला तो वो घबरा गयी और उसने रावण को बहुत समझाया पर वह नहीं समझा और सभा में चले गया।


 


रावण के भाई विभीषण ने भी रावण को सभा में समझाया और सीता माता को समान्पुर्वक श्री राम को सौंप देने के लिए कहा परन्तु यह सुन कर रावण क्रोधित हो गया और अपने ही भाई को लात मार दिया जिसके कारण विभीषण सीढियों से नीचे आ गिरे। 


विभीषण ने अपना राज्य छोड़ दिया और वो श्री राम के पास गए।राम ने भी ख़ुशी के साथ उन्हें स्वीकार किया और अपने डेरे में रहने की जगह दी।


 


आखरी बार श्री राम ने बाली पुत्र अंगद कुमार को भेजा पर रावण तब भी नहीं माना।


 


रामायण में अधर्म पर धर्म की विजय के लिए युद्ध 


श्री राम और रावण की सेना के बिच भीषण युद्ध हुआ। 


इस युद्ध में लक्ष्मण पर मेघनाद ने शक्ति बांण से प्रहार किया था जिसके कारण हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने के लिए हिमालय पर्वत गए। 

परन्तु वे उस पौधे को पहेचन ना सके इसलिए वे पूरा हिमालय पर्वत ही उठा लाये थे।


 


इस युद्ध में रावण की सेना के श्री राम की सेना प्रसत कर देती है और अंत में श्री राम रावण के नाभि में बाण मार कर उसे  मार देते हैं और सीता माता को छुड़ा लाते हैं।


 


श्री राम विभीषण को लंका का राजा बनाते देते हैं। 


श्री राम माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अपने राज्य 14वर्ष के वनवास से लौटते हैं।


 


उत्तर रामायण के अनुसार अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण होने के पश्चात भगवान श्रीराम ने बड़ी सभा का आयोजन कर सभी देवताओं, ऋषि-मुनियों, किन्नरों, यक्षों व राजाओं आदि को उसमें आमंत्रित किया। 


सभा में आए नारद मुनि के भड़काने पर एक राजन ने भरी सभा में ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर सभी को प्रणाम किया। 


ऋषि विश्वामित्र गुस्से से भर उठे और उन्होंने भगवान श्रीराम से कहा कि अगर सूर्यास्त से पूर्व श्रीराम ने उस राजा को मृत्यु दंड नहीं दिया तो वो राम को श्राप दे देंगे। 


 


इस पर श्रीराम ने उस राजा को सूर्यास्त से पूर्व मारने का प्रण ले लिया। 


श्रीराम के प्रण की खबर पाते ही राजा भागा-भागा हनुमान जी की माता अंजनी की शरण में गया तथा बिना पूरी बात बताए उनसे प्राण रक्षा का वचन मांग लिया। 


तब माता अंजनी ने हनुमान जी को राजन की प्राण रक्षा का आदेश दिया। 


हनुमान जी ने श्रीराम की शपथ लेकर कहा कि कोई भी राजन का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा परंतु जब राजन ने बताया कि भगवान श्रीराम ने ही उसका वध करने का प्रण किया है तो हनुमान जी धर्म संकट में पड़ गए कि राजन के प्राण कैसे बचाएं और माता का दिया वचन कैसे पूरा करें तथा भगवान श्रीराम को श्राप से कैसे बचाएं।


 


धर्म संकट में फंसे हनुमानजी को एक योजना सूझी। 


हनुमानजी ने राजन से सरयू नदी के तट पर जाकर राम नाम जपने के लिए कहा। हनुमान जी खुद सूक्ष्म रूप में राजन के पीछे छिप गए। 


जब राजन को खोजते हुए श्रीराम सरयू तट पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि राजन राम-राम जप रहा है। 


 


प्रभु श्रीराम ने सोचा, “ये तो भक्त है, मैं भक्त के प्राण कैसे ले लूं”। 


 


श्री राम ने राज भवन लौटकर ऋषि विश्वामित्र से अपनी दुविधा कही। विश्वामित्र अपनी बात पर अडिग रहे और जिस पर श्रीराम को फिर से राजन के प्राण लेने हेतु सरयू तट पर लौटना पड़ा। 


अब श्रीराम के समक्ष भी धर्मसंकट खड़ा हो गया कि कैसे वो राम नाम जप रहे अपने ही भक्त का वध करें। 


राम सोच रहे थे कि हनुमानजी को उनके साथ होना चाहिए था परंतु हनुमानजी तो अपने ही आराध्य के विरुद्ध सूक्ष्म रूप से एक धर्मयुद्ध का संचालन कर रहे थे। 


हनुमानजी को यह ज्ञात था कि राम नाम जपते हु‌ए राजन को कोई भी नहीं मार सकता, खुद मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी नहीं।


 


श्रीराम ने सरयू तट से लौटकर राजन को मारने हेतु जब शक्ति बाण निकाला तब हनुमानजी के कहने पर राजन राम-राम जपने लगा। 


राम जानते थे राम-नाम जपने वाले पर शक्तिबाण असर नहीं करता। वो असहाय होकर राजभवन लौट गए। 


विश्वामित्र उन्हें लौटा देखकर श्राप देने को उतारू हो गए और राम को फिर सरयू तट पर जाना पड़ा। 


 


इस बार राजा हनुमान जी के इशारे पर जय जय सियाराम जय जय हनुमान गा रहा था। 


प्रभु श्री राम ने सोचा कि मेरे नाम के साथ-साथ ये राजन शक्ति और भक्ति की जय बोल रहा है। 


ऐसे में कोई अस्त्र-शस्त्र इसे मार नहीं सकता। इस संकट को देखकर श्रीराम मूर्छित हो गए। 


तब ऋषि व‌शिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र को सलाह दी कि राम को इस तरह संकट में न डालें। 


उन्होंने कहा कि श्रीराम चाह कर भी राम नाम जपने वाले को नहीं मार सकते क्योंकि जो बल राम के नाम में है और खुद राम में नहीं है। 


संकट बढ़ता देखकर ऋषि विश्वामित्र ने राम को संभाला और अपने वचन से मुक्त कर दिया। 


मामला संभलते देखकर राजा के पीछे छिपे हनुमान वापस अपने रूप में आ गए और श्रीराम के चरणों मे आ गिरे। 


 


तब प्रभु श्रीराम ने कहा कि हनुमानजी ने इस प्रसंग से सिद्ध कर दिया है कि भक्ति की शक्ति सैदेव आराध्य की ताकत बनती है तथा सच्चा भक्त सदैव भगवान से भी बड़ा रहता है। 


इस प्रकार हनुमानजी ने राम नाम के सहारे श्री राम को भी हरा दिया। धन्य है राम नाम और धन्य धन्य है प्रभु श्री राम के भक्त हनुमान। 


 


“जिस सागर को बिना सेतु के, लांघ सके न राम। कूद गए हनुमान जी उसी को, लेकर राम का नाम। तो अंत में निकला ये परिणाम कि राम से बड़ा राम का नाम “


 


वनवास यात्रा के साक्ष्य बने स्थानों की –  वहीं यदि बात यदि उनके वनवास के दिनों की घटनाओं की करें तो वहां से भी हम बहुत कुछ जान-सीख सकते है। 


आईए जाने भारत में स्थित उन स्थानों एवं घटनाओं के बारे में जहां श्रीराम के पावन चरण पड़े थे।


 


रामायण में केवट प्रसंग


वाल्मिकी रामायण के अनुसार अयोध्या का राजमहल त्यागने के बाद भगवान राम माता सीता, अनुज लक्ष्मण संग सर्वप्रथम अयोध्या से कुछ दूर मनसा नदी के समीप पहुंचे। 


वहां से गोमती नदी पार कर वे इलाहाबाद के समीप वेश्रंगवेपुर गये जो राजा गुह का क्षेत्र था। 


जहां उनकी भेंट केवट से हुई जिसको उन्होंने गंगा पार करवाने को कहा था। 


वर्तमान में वेश्रंगवेपुर सिगरौरी के नाम से जाना जाता है जो कि इलाहाबाद के समीप स्थित है। 


वहीं गंगा पार कर भगवान ने कुरई नामक स्थान में कुछ दिन विश्राम किया था। 


यहां एक छोटा मंदिर है जो उनके विश्रामस्थल के रूप में जाना जाता है।


 


रामायण में चित्रकुट का घाट


 


कुरई से आगे भगवान राम ‘प्रयाग’ आज के इलाहाबाद की ओर गए।


इलाहाबाद स्थित बहुत से स्मारक उनके वहां व्यतीत किए दिनों के साक्ष्य है। 


इसमें वाल्मीकि आश्रम, माडंव्य आश्रम, भरतकूप आदि प्रमुख है। 


विद्वानों के अनुसार यही वह स्थान है जहां उनके अनुज भरत उन्हें मनाने के लिए आए थे और श्रीराम के मना करने के बाद उनकी चरण पादुकाओं को राजसिंहासन पर रखकर अयोध्या नगरी का भार संभाला था। 


क्योंकि तब दशरथ भी स्वर्ग सिधार चुके थे।


 


रामायण में अत्रि ऋषि का आश्रम


 


वहां से प्रस्थान कर भगवान सतना मध्यप्रदेश पहुंचे। यहां उन्होंने अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ समय व्यतीत किया। 


अत्रि ऋषि अपनी पत्नी, माता अनुसूइया के साथ निवास करते थे। 


अत्रि ऋषि, माता अनुसूइया एवं उनके भक्त सभी वन के राक्षसों से काफी भयभीत रहते थे। 


श्रीराम ने उनके भय को दूर करने के लिए सभी राक्षसों का वध कर दिया।


 


रामायण में दंडकारणय


 


अत्रि ऋषि से आज्ञा लेकर भगवान ने आगे पड़ने वाले दंडकारयण ‘छतीसगढ़‘ के वनों में अपनी कुटिया बनाई। 


यहां के जंगल काफी घने है और आज भी यहां भगवान राम के निवास के चिन्ह मिल जाते है। 


मान्यता ये भी है कि इस वन का एक विशाल हिस्सा  भगवान राम के नाना एवं कुछ पर रावण के मित्र राक्षस वाणसुर के राज्य में पड़ता था। 


यहां प्रभु ने लम्बा समय बिताया एवं नजदीक के कई क्षेत्रों का भी भ्रमण भी किया। पन्ना, रायपुर, बस्तर, जगदलपुर में बने कई स्मारक स्थल इसके प्रतीक है। 


वहीं शहडोल, अमरकंटक के समीप स्थित सीताकुंड भी बहुत प्रसिद्ध है। यहीं पास में सीता बेंगरा एवं लक्ष्मण बेंगरा नामक दो गुफाए भी है।


 


रामायण में पंचवटी में राम


दंडकारणय में कुछ वर्ष व्यतीत करने के बाद प्रभु गोदावरी नदी, ‘नासिक के समीप’ स्थित पंचवटी आ गए। 


कहते है यहीं लक्ष्मण ने रावण की बहन शूर्पनखा की नाक काटी थी। इसके बाद यह स्थान नासिक के नाम से प्रसिद्ध हो गया। 


‘संस्कृत में नाक को नासिक कहते है।‘ जबकि पंचवटी का नाम गोदावरी के तट पर लगाए गए पांच वृक्ष पीपल, बरगद, आवला, बेल तथा अशोक के नाम पर पड़ा। 


मान्यता है कि ये सभी वृक्ष राम- सीता, लक्ष्मण ने लगाए थे। राम-लक्ष्मण ने यहीं खर-दूषण साथ युद्ध किया था। साथ ही मारीच वध भी इसी क्षेत्र में हुआ था।


 


रामायण में सीताहरण का स्थान


नासिक से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित ताकड़े गांव के बारे में मान्यता है कि इसी स्थान के समीप भगवान की कुटिया थी जहां से रावण ने माता सीता का हरण किया था।  


इसके पास ही जटायु एवं रावण के बीच युद्ध भी हुआ था एवं मृत्युपूर्व जटायु ने यहीं राम को सीताहरण के बारे में बताया था। 


यह स्थान सर्वतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। 


जबकि आंध्रप्रदेश के खम्मम के बारें में कई लोगो की मान्यता है कि राम-सीता की कुटिया यहां थी।


 


रामायण में शबरी को दर्शन


जटायु के अंतिम सस्कार के बाद राम-लक्ष्मण सीता की खोज में ऋष्यमूक पर्वत की ओर गए। 


रास्ते में वे पम्पा नदी के समीप शबरी की कुटिया में पहुंचे। 


भगवान राम के शबरी से हुई भेंट से भला कौन परिचित नहीं है। 


पम्पा नदी केरल में है प्रसिद्द सबरीमला मंदिर इसके तट पर बना हुआ है।


 


रामायण में हनुमान से भेंट


घने चंदन के वनों को पार करते हुए जब भगवान ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे तब वहां उन्हें सीता के आभूषण मिले एवं हनुमान से भेंट हुई। 


यहीं समीप में उन्होंने बाली का वध किया था यह स्थान कर्णाटक के हम्मी, बैल्लारी क्षेत्र में स्थित है। 


पहाड़ के नीचे श्रीराम का एक मंदिर है एवं नजदीक स्थित पहाड़ के बारें मान्यता है कि वहां मतंग ऋषि का आश्रम था इसलिए पहाड़ का मतंग पर्वत है।


 


रामायण में सेना का गठन


हनुमान एवं सुग्रीव से मित्रता के बाद राम ने अपनी सेना का गठन किया एवं किष्किन्धा ‘कर्णाटक’ से प्रस्थान किया। 


मार्ग में कई वनों, नदियों को पार करते हुए वो रामेश्वरम पहुंचे। यहां उन्होंने युद्ध में विजय के लिए भगवान शिव की पूजा की। 


रामेश्वरम में तीन दिनों के प्रयास के बाद भगवान ने उस स्थान का पता लगवा लिया जहां से आसानी से लंका जाया जा सकता था। 


फिर अपनी सेना के वानर नल-नील की सहायता से उस स्थान पर रामसेतु का निर्माण करवाया।


 


रामायण  कथा राम की Ramayan ki katha


वैसे तो रामायण की कहानी बहुत लम्बी है परन्तु आज हम आपके सामने इस कहानी का एक संक्षिप्त रूप रेखा प्रस्तुत कर रहे हैं। 


रामयण श्री राम की एक अद्भुत अमर कहानी है जो हमें विचारधारा, भक्ति, कर्तव्य, रिश्ते, धर्म, और कर्म को सही मायने में सिखाता है।


श्री राम अयोध्या के राजा दशरथ के जेष्ट पुत्र थे और माता सीता उनकी धर्मपत्नी थी। 


राम बहुत ही साहसी, बुद्धिमान और आज्ञाकारी और सीता बहुत ही सुन्दर, उदार और पुण्यात्मा थी। 


माता सीता की मुलाकात श्री राम से उनके स्वयंवर में हुई जो सीता माता के पिता, मिथिला के राजा जनक द्वारा संयोजित किया गया था। 


यह स्वयंवर माता सीता के लिए अच्छे वर की खोज में आयोजित किया गया था।


उस आयोजन में कई राज्यों के राजकुमारों और राजाओं को आमंत्रित किया गया था। 


शर्त यह थी की जो कोई भी शिव धनुष को उठा कर धनुष के तार को खीच सकेगा उसी का विवाह सीता से होगा। 


सभी राजाओं ने कोशिश किया परन्तु वे धनुष को हिला भी ना सके। 


जब श्री राम की बारी आई तो श्री राम ने एक ही हाथ से धनुष उठा लिया और जैस ही उसके तार को खीचने की कोशिश की वह धनुष दो टुकड़ों में टूट गया। 


इस प्रकार श्री राम और सीता का मिलन / विवाह हुआ।



 


अयोध्या के राजा दशरथ के तीन पत्नियां और चार पुत्र थे। 


राम सभी भाइयों में बड़े थे और उनकी माता का नाम कौशल्या था। 


भरत राजा दशरथ के दूसरी और प्रिय पत्नी कैकेयी के पुत्र थे। दुसरे दो भाई थे, लक्ष्मण और सत्रुघन जिनकी माता का नाम था सुमित्रा।


प्रभु राम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। 


अयोध्या के राजा दशरथ की तीन रानियां थीं। किन्तु किसी रानी से संतान की प्राप्ति नही हुई। 


तत्पश्चात, राजा दशरथ ने पुत्र पाने की इच्छा अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ से बताई। महर्षि वशिष्ठ ने विचार कर ऋषि श्रृंगी को आमंत्रित किया। ऋषि श्रृंगी ने राजा दशरथ को पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करने का प्रावधान बताया।


ऋषि श्रृंगी के निर्देशानुसार राजा दशरथ ने यज्ञ करवाया जब यज्ञ में पूर्णाहुति दी जा रही थी उस समय अग्नि कुण्ड से अग्नि देव मनुष्य रूप में प्रकट हुए तथा अग्नि देव ने राजा दशरथ को खीर से भरा कटोरा प्रदान किया। 


तत्पश्चात ऋषि श्रृंगी ने बताया हे राजन, अग्नि देव द्वारा प्रदान किये गए खीर को अपनी सभी रानियों को प्रसाद रूप में दीजियेगा।


राजा दशरथ ने वह खीर अपनी तीनो रानियों कौशल्या, कैकेयी एवम सुमित्रा में बांट दी।


 


प्रसाद ग्रहण के पश्चात निश्चित अवधि में अर्थात चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की नवमी को राजा दशरथ के घर में माता कौशल्या के गर्भ से राम जी का जन्म हुआ तथा कैकेयी के गर्भ से भरत एवं सुमित्रा के गर्भ से लक्ष्मण तथा शत्रुधन का जन्म हुआ। 


राजा दशरथ के घर में चारो राजकुमार एक साथ समान वातावरण में पलने लगे। राम जन्म की ख़ुशी में उसी समय से राम भक्त रामनवमी पर्व मनाते है।


 



 


राम नवमी पौराणिक मान्यताएं Ram Navami Katha 


 


श्री रामनवमी की कहानी लंकाधिराज रावण से शुरू होती है। 


रावण अपने राज्यकाल में बहुत अत्याचार करता था। 


उसके अत्याचार से पूरी जनता त्रस्त थी, यहां तक की देवतागण भी, क्योंकि रावण ने ब्रह्मा जी से अमर होने का वरदान ले लिया था। 


उसके अत्याचार से तंग होकर देवतागण भगवान विष्णु के पास गए और प्रार्थना करने लगे। 


फलस्वरूप प्रतापी राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या की कोख से भगवान विष्णु ने राम के रूप में रावण को परास्त करने हेतु जन्म लिया। 


तब से चैत्र की नवमी तिथि को रामनवमी के रूप में मनाने की परंपरा शुरू हुई। 


ऐसा भी कहा जाता है कि नवमी के दिन ही स्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना शुरू की थी।


 


 पुराणों के मुताबिक राम के जन्म के बारे में भगवान शिव ने मां पार्वती को बताया था वही आज हम आपको बताने जा रहें कि भगवान राम नें जन्म क्यों लिया था। 


 


एक कहानी है कि ब्रह्मणों के शाप के कारण प्रतापभान, अरिमर्दन और धर्मरूचि यह तीनो रावण ,कुम्भकरण और विभिषन बनें। 


रावण ने अपनी प्रजा पर बहुत अत्याचार किये।


 


एक बार तीनो भाइयों ने घोर तप किया । तप से ब्रह्मा जी ने खुश होकर वर मांगने को कहा। 


इस पर रावण ने कहा कि हे प्रभु हम वानर और इंसान दाे जातियों को छोड़कर और किसी के मारे से न मरे यह वर दीजिए।


शिव जी ने और  ब्रह्म जी ने रावण काे वर दिया ।


 


इसके बाद शिव जी ने और ब्रह्मा जी ने विशालकाय कुम्भकर्ण को देखकर सोचा कि यह अगर रोज भोजन करेगा तो पृथ्वी को नाश हो जायेगा। 


तब मां सरस्वती ने उसकी बुद्धी फेर दी और कुम्भकर्ण नें 6 माह की नींद मांग ली । 


विभीषण ने प्रभु के चारणों में अनन्य और निष्काम प्रेम की अभिलाषा जताई। वर देकर ब्रह्मा जी चले गये। 


 


तुलसीदास जी ने लिखा है कि जब पृथ्वी पर रावण का अत्याचार बढ़ा और धर्म की हानि होने लगी तब भगवान शिव कहते हैं कि –


 


राम जनम के हेतु अनेका । परम विचित्र एक तें एका ।।


जब जब होई धरम की हानि ।  बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ।।


तब तब प्रभु धरि विविध सरीरा।  हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ।।


 


 


यानी जब-जब धर्म का ह्रास होता है और अभिमानी राक्षस प्रवृत्ति के लोग बढ़ने लगते हैं तब तब कृपानिधान प्रभु भांति-भांति के दिव्य शरीर धारण कर सज्जनों की पीड़ा हरते हैं। 


 


वे असुरों को मारकर देवताओं को स्थापित करते हैं। अपने वेदों की मर्यादा की रक्षा करते हैं। यही श्रीराम जी के अवतार का सबसे बड़ा कारण है।  


 


जब राम को एक तरफ राज तिलक करने की तैयारी हो रही थी तभी उसकी सौतेली माँ कैकेयी, अपने पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बनाने का षड्यंत्र रच रही थी। 


 


यह षड्यंत्र बूढी मंथरा के द्वारा किया गया था। 


रानी कैकेयी ने एक बार राजा दशरथ की जीवन की रक्षा की थी तब राजा दशरथ ने उन्हें कुछ भी मांगने के लिए पुछा था पर कैकेयी ने कहा समय आने पर मैं मांग लूंगी।


 


उसी वचन के बल पर कैकेयी ने राजा दशरथ से पुत्र भरत के लिए अयोध्या का सिंघासन और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास माँगा। 


 


श्री राम तो आज्ञाकारी थे इसलिए उन्होंने अपने सौतेली माँ कैकेयी की बातों को आशीर्वाद माना और माता सीता और प्रिय भाई लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष का वनवास व्यतीत करने के लिए राज्य छोड़ कर चले गए।


 


इस असीम दुख को राजा दशरथ सह नहीं पाए और उनकी मृत्यु हो गयी। 


 


कैकेयी के पुत्र भरत को जब यह बात पता चली तो उसने भी राज गद्दी लेने से इंकार कर दिया।


 


रामायण में चौदह वर्ष का वनवास  Ramayan 14 years of exile 


राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के लिए निकल पड़े। 


 


रास्ते में उन्होंने कई असुरों का संहार किया और कई पवित्र और अच्छे लोगों से भी वे मिले। 


वे वन चित्रकूट में एक कुटिया बना कर रहने लगे। 


एक बार की बात है लंका के असुर राजा रावन की छोटी बहन सूर्पनखा ने राम को देखा और वह मोहित हो गयी।


 


उसने  राम को पाने की कोशिश की पर राम ने उत्तर दिया – मैं तो विवाहित हूँ मेरे भाई लक्ष्मण से पूछ के देखो। 


 


तब सूर्पनखा लक्ष्मण के पास जा कर विवाह का प्रस्ताव रखने लगी पर लक्ष्मण ने साफ़ इनकार कर दिया। 


तब सूर्पनखा ने क्रोधित हो कर माता सीता पर आक्रमण कर दिया। 


यह देख कर लक्ष्मण ने चाकू से सूर्पनखा का नाक काट दिया। कटी हुई नाक के साथ रोते हुए जब सूर्पनखा लंका पहुंची तो सारी बातें जान कर रावण को बहुत क्रोध आया। 


उसने बाद रावन ने सीता हरण की योजना बनायीं।


 


रामायण में सीता हरण  Sita Haran katha


योजना के तहत रावन ने मारीच राक्षश को चित्रकूट के कुटिया के पास एक सुन्दर हिरन के रूप में भेजा। 


 


जब मारीच को माता सीता ने देखा तो उन्होंने श्री राम से उस हिरण को पकड़ के लाने के लिए कहा। 


सीता की बात को मान कर राम उस हिरण को पकड़ने उसके पीछे-पीछे गए और लक्ष्मण को आदेश दिया की वो सीता को छोड़ कर कहीं ना जाए।


बहुत पीछा  करने के बाद राम ने उस हिरण को बाण से मारा। 


जैसे ही राम का बाण हिरण बने मारीच को लगा वह अपने असली राक्षस रूप में आ गया और राम के आवाज़ में सीता और लक्ष्मण को मदद के लिए पुकारने लगा।


 


सीता ने जब राम के आवाज़ में उस राक्षश के विलाप को देखा तो वो घबरा गयी और उसने लक्ष्मण को राम की मदद के लिए वन जाने को कहा। 


 


लक्ष्मण ने सीता माता के कुटिया को चारों और से “लक्ष्मण रेखा” से सुरक्षित किया और वो श्री राम की खोज करने वन में चले गए।


 


योजना के अनुसार रावण एक साधू के रूप में कुटिया पहुंचा और भिक्षाम देहि का स्वर लगाने लगा। 


 


जैसे ही रावण ने कुटिया के पास लक्ष्मण रेखा पर अपना पैर रखा उसका पैर जलने लगा यह देखकर रावण ने माता सीता को बाहर आकर भोजन देने के लिए कहा। 


जैसे ही माता सीता लक्ष्मण रेखा से बाहर निकली रावण ने पुष्पक विमान में उनका अपहरण कर लिया।


 


जब राम और लक्ष्मण को यह पता चला की उनके साथ छल हुआ है तो वो कुटिया की और भागे पर वहां उन्हें कोई नहीं मिला। 


 


जब रावण सीता को पुष्पक विमान में लेकर जा रहा था तब बूढ़े जटायु पक्षी ने रावण से सीता माता को छुड़ाने के लिए युद्ध किया परन्तु रावण ने जटायु का पंख काट डाला। 


जब राम और लक्ष्मण सीता को ढूँढते हुए जा रहे थे तो रास्ते में जटायु का शारीर पड़ा था और वो राम-राम विलाप कर रहा था। 


जब राम और लक्ष्मण ने उनसे सीता के विषय में पुछा तो जटायु ने उन्हें बताया की रावण माता सीता को उठा ले गया है और यह बताते बताते उसकी मृत्यु हो गयी।


 


रामायण में राम और हनुमान का मिलन  Ram and Hanuman  Milan


हनुमान किसकिन्धा के राजा सुग्रीव की वानर सेना के मंत्री थे। 


 


राम और हनुमान पहली बार रिशिमुख पर्वत पर मिले जहाँ सुग्रीव और उनके साथी रहते थे। 


सुग्रीव के भाई बाली ने उससे उसका राज्य भी छीन लिया और उसकी पत्नी को भी बंदी बना कर रखा था।


 



 


 


जब सुग्रीव राम से मिले वे दोनों मित्र बन गए। 


 


जब रावण पुष्पक विमान में सीता माता को ले जा रहा था तब माता सीता ने निशानी के लिए अपने अलंकर फैक दिए थे वो सुग्रीव की सेना के कुछ वानरों को मिला था। 


जब उन्होंने श्री राम को वो अलंकर दिखाये तो राम और लक्ष्मण के आँखों में आंसू आगये।


 


श्री राम ने बाली का वध करके सुग्रीव को किसकिन्धा का राजा दोबारा बना दिया। 


 


सुग्रीव ने भी मित्रता निभाते हुए राम को वचन दिया की वो और उनकी वानर सेना भी सीता माता को रावन के चंगुल से छुडाने के लिए पूरी जी जान लगा देंगे।


 


 


रामायण में सुग्रीव की वानर सेना


उसके बाद हनुमान, सुग्रीव, जामवंत, ने मिल कर सुग्रीव की वानर सेना का नेतृत्व किया और चारों दिशाओं में अपनी सेना को भेजा। 


 


सभी दिशाओं में ढूँढने के बाद भी कुछ ना मिलने पर ज्यादातर सेना वापस लौट आये। 


दक्षिण की तरफ हनुमान एक सेना लेकर गए जिसका नेतृत्व अंगद कर रहे थे। 


जब वे दक्षिण के समुंद तट पर पहुंचे तो वे भी उदास होकर विन्द्य पर्वत पर इसके विषय में बात कर रहे थे।


 


वहीँ कोने में एक बड़ा पक्षी बैठा था जिसका नाम था सम्पाती। 


 


सम्पति वानरों को देखकर बहुत खुश हो गया और भगवान् का शुक्रिया करने लगा इतना सारा भोजन देने के लिए। 


जब सभी वानरों को पता चला की वह उन्हें खाने की कोशिश करने वाला था तो सभी उसकी घोर आलोचना करने लगे और महान पक्षी जटायु का नाम लेकर उसकी वीरता की कहानी सुनाने लगे।


 


जैसे ही जटायु की मृत्यु की बात उसे पता चला वह ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगा। 


 


उसने वानर सेना को बताया की वो जटायु का भाई है और यह भी बताया की उसने और जटायु ने मिलकर स्वर्ग में जाकर इंद्र को भी युद्ध में हराया था। 


उसने यह भी बताया की सूर्य की तेज़ किरणों से जटायु की रक्षा करते समय उसके सभी पंख भी जल गए और वह उस पर्वत पर गिर गया। 


सम्पाती ने वानरों से बताया कि वह बहुत ज्यादा जगहों पर जा चूका है और उसने यह भी बताया की लंका का असुर राजा रावण ने सीता को अपहरण किया है और उसी दक्षिणी समुद्र के दूसरी ओर उसका राज्य है।


 


रामायण में लंका की ओर हनुमान की समुद्र यात्रा 


जामवंत ने हनुमान के सभी शक्तियों को ध्यान दिलाते हुए कहा की हे हनुमान आप तो महा ज्ञानी, वानरों के स्वामी और पवन पुत्र हैं। 


 


यह सुन कर हनुमान का मन हर्षित हो गया और वे समुंद्र तट किनारे स्तिथ सभी लोगों से बोले आप सभी कंद मूल खाकर यही मेरा इंतज़ार करें जब तक में सीता माता को देखकर वापस ना लौट आऊं। 


ऐसा कहकर वे समुद्र के ऊपर से उड़ते हुए लंका की ओर चले गए।


 


रास्ते में जाते समय उन्हें सबसे पहले मेनका पर्वत आये। 


 


उन्होंने हनुमान जी से कुछ देर आराम करने के लिए कहा पर हनुमान ने उत्तर दिया – जब तक में श्री राम जी का कार्य पूर्ण ना कर लूं मेरे जीवन में विश्राम की कोई जगह नहीं है और वे उड़ाते हुए आगे चले गए।


 


देवताओं ने हनुमान की परीक्षा लेने के लिए सापों की माता सुरसा को भेजा। 


 


सुरसा ने हनुमान को खाने की कोशिश की पर हनुमान को वो खा ना सकी। हनुमान उसके मुख में जा कर दोबारा निकल आये और आगे चले गए।


 


समुंद्र में एक छाया को पकड़ कर खा लेने वाली राक्षसी रहती थी। 


 


उसने हनुमान को पकड़ लिया पर हनुमान ने उसे भी मार दिया।


 


रामायण में हनुमान लंका दहन की कहानी 


समुद्र तट पर पहुँचने के बाद हनुमान एक पर्वत के ऊपर चढ़ गए और वहां से उन्होंने लंका की और देखा। 


 


लंका का राज्य उन्हें दिखा जिसके सामने एक बड़ा द्वार था और पूरा लंका सोने का बना हुआ था।


 


हनुमान ने एक छोटे मछर के आकार जितना रूप धारण किया और वो द्वार से अन्दर जाने लगे। उसी द्वार पर लंकिनी नामक राक्षसी रहती थी।  


 


उसने हनुमान का रास्ता रोका तो हनुमान ने एक ज़ोर का घूँसा दिया तो निचे जा कर गिरी। 


उसने डर के मारे हनुमान को हाथ जोड़ा और लंका के भीतर जाने दिया।


 


हनुमान ने माता सीता को महल के हर जगह ढूँढा पर वह उन्हें नहीं मिली।  


 


थोड़ी दे बाद ढूँढने के बाद उन्हें एक ऐसा महल दिखाई दिया जिसमें एक छोटा सा मंदिर था एक तुलसी का पौधा भी। 


हनुमान जी को यह देखकर अचंभे में पड गए औए उन्हें यह जानने की इच्छा हुई की आखिर ऐसा कौन है जो इन असुरों के बिच श्री राम का भक्त है। 


यह जानने के लिए हनुमान ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और उन्हें पुकारा। 


विभीषण अपने महल से बाहर निकले और जब उन्होंने हनुमान को देखा तो वो बोले – हे महापुरुष आपको देख कर मेरे मन में अत्यंत सुख मिल रहा है, क्या आप स्वयं श्री राम हैं?


 


हनुमान ने पुछा आप कौन हैं? विभीषण ने उत्तर दिया – मैं रावण का भाई विभीषण हूँ।


 


यह सुन कर हनुमान अपने असली रूप में आगए और श्री रामचन्द्र जी के विषय में सभी बातें उन्हें बताया। 


 


विभीषण ने निवेदन किया- हे पवनपुत्र मुझे एक बार श्री राम से मिलवा दो। 


हनुमान ने उत्तर दिया – मैं श्री राम जी से ज़रूर मिलवा दूंगा परन्तु पहले मुझे यह बताये की मैं जानकी माता से कैसे मिल सकता हूँ?


 


रामायण में अशोक वाटिका में हनुमान सीता भेंट 


विभीषण ने हनुमान को बताया की रावण ने सीता माता को अशोक वाटिका में कैद करके रखा है। 


 


यह जानने के बाद हनुमान जी ने एक छोटा सा रूप धारण किया और वह अशोक वाटिका पहुंचे।  


वहां पहुँचने के बाद उन्होंने देखा की रावण अपने दसियों के साथ उसी समय अशोक वाटिका में में पहुंचा और सीता माता को अपने ओर देखने के लिए साम दाम दंड भेद का उपयोग किया पर तब भी सीता जी ने एक बार भी उसकी ओर नहीं देखा। 


रावण ने सभी राक्षसियों को सीता को डराने के लिए कहा।


 


पर त्रिजटा नामक एक राक्षसी ने माता सीता की बहुत मदद और देखभाल की और अन्य राक्षसियों को भी डराया जिससे अन्य सभी राक्षसी भी सीता की देखभाल करने लगे।


 


कुछ देर बाद हनुमान ने सीता जी के सामने श्री राम की अंगूठी डाल दी। 


 


श्री राम नामसे अंकित अंगूठी देख कर सीता माता के आँखों से ख़ुशी के अंशु निकल पड़े। 


परन्तु सीता माता को संदेह हुआ की कहीं यह रावण की कोई चाल तो नहीं। 


तब सीता माता ने पुकारा की कौन है जो यह अंगूठी ले कर आया है। उसके बाद हनुमान जी प्रकट हुए पर हनुमान जी को देखकर भी सीता माता को विश्वस नहीं हुआ।


 


सके बाद हनुमान जी ने मधुर वचनों के साथ रामचन्द्र के गुणों का वर्णन किया और बताया की वो श्री राम जी के दूत हैं। 


 


श्री राम नवमी, विजय दशमी, सुंदरकांड, रामचरितमानस कथा, हनुमान जन्मोत्सव और अखंड रामायण के पाठ में प्रमुखता से गाये जाने वाला भजन।


 


राम कहानी सुनो रे राम कहानी।


कहत सुनत आवे आँखों में पानी।


श्री राम जय जय राम


 


दशरथ के राज दुलारे, कौशल्या की आँख के तारे।


वे सूर्य वंश के सूरज, वे रघुकुल के उज्जयारे।


राजीव नयन बोलें मधुभरी वाणी।


। राम कहानी सुनो रे राम कहानी…।


 


शिव धनुष भंग प्रभु करके, ले आए सीता वर के।


घर त्याग भये वनवासी, पित की आज्ञा सर धर के।


लखन सिया ले संग, छोड़ी रजधानी।


। राम कहानी सुनो रे राम कहानी…।


 


खल भेष भिक्षु धर के, भिक्षा का आग्रह करके।


उस जनक सुता सीता को, छल बल से ले गया हर के।


बड़ा दुःख पावे राजा राम जी की रानी।


। राम कहानी सुनो रे राम कहानी…।


 


श्री राम ने मोहे पठायो, मैं राम दूत बन आयो।


सीता माँ की सेवा में रघुवर को संदेसा लायो।


और संग लायो, प्रभु मुद्रिका निसानी।


 


राम कहानी सुनो रे राम कहानी।


कहत सुनत आवे आँखों में पानी।


श्री राम जय जय राम


 


 


 


 


 


सीता ने व्याकुलता से श्री राम जी का हाल चाल पुछा। हनुमान जी ने उत्तर दिया – हे माते श्री राम जी ठीक हैं और वे आपको बहुत याद करते हैं। 


 


वे बहुत जल्द ही आपको लेने आयेंगे और में शीघ्र ही आपका सन्देश श्री राम जी के पास पहुंचा दूंगा।


 


तभी हनुमान ने सीता माता से श्री राम जी को दिखने के लिए चिन्ह माँगा तो माता सीता ने हनुमान को अपने कंगन उतार कर दे दिए।


 


रामायण में हनुमान लंका दहन  


हनुमान जी को बहुत भूख लग रहा था तो हनुमान अशोक वाटिका में लगे पेड़ों के फलों को खाने लगे। 


 


फलों को खाने के साथ-साथ हनुमान उन पेड़ों को तोड़ने लगे तभी रावण के सैनिकों ने हनुमान पर प्रहार किया पर हनुमान ने सबको मार डाला।


 



 


 


 


जब रावण को इस बात का परा चला की कोई बन्दर अशोक वाटिका में उत्पात मचा रहा है तो उसने अपने पुत्र अक्षय कुमार को भेजा हनुमान का वध करने के लिए। पर हनुमान जी ने उसे क्षण भर में ऊपर पहुंचा दिया।


 


कुछ देर बाद जब रावण को जब अपने पुत्र की मृत्यु का पता चला वह बहुत ज्यादा क्रोधित हुआ। 


 


उसके बाद रावण ने अपने  जेष्ट  पुत्र मेघनाद को भेजा। 


हनुमान के साथ मेघनाद का बहुत ज्यादा युद्ध हुआ परकुछ ना कर पाने के बाद मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र चला दिया। 


ब्रह्मास्त्र का सम्मान करते हुए हनुमान स्वयं बंधग बन गए।


 


हनुमान को रावण की सभा में लाया गया। 


 


रावण हनुमान को देख कर हंसा और फिर क्रोधित हो कर उसने प्रश्न किया – रे वानर, तूने किस कारण अशोक वाटिका को तहस-नहस कर दिया? 


तूने किस कारण से मेरे सैनिकों और पुत्र का वध कर दिया क्या तुझे अपने प्राण जाने का डर नहीं है?


 


यह सुन कर हनुमान ने कहा – हे रावण, जिसने महान शिव धनुष को पल भर में तोड़ डाला, जिसने खर, दूषण, त्रिशिरा और बाली को मार गिराया, जिसकी प्रिय पत्नीका तुमने अपहरण किया, मैं उन्ही का दूत हूँ। 


 


मुजे भूख लग रहा था इसलिए मैंने फल खाए और तुम्हारे राक्षसों ने मुझे खाने नहीं दिया इसलिए मैंने उन्हें मार डाला। 


अभी भी समय है सीता माता को श्री राम को सौंप दो और क्षमा मांग लो।


 


 


रावण हनुमान की बता सुन कर हसने लगा और बोला – रे दुष्ट, तेरी मृत्यु तेरे सिर पर है। 


 


ऐसा कह कर रावण ने अपने मंत्रियों को हनुमान को मार डालने का आदेश दिया। यह सुन कर सभी मंत्री हनुमान को मारने दौड़े। 


तभी विभीषण वहां आ पहुंचे और बोले- रुको, दूत को मारना सही नहीं होगा यह निति के विरुद्ध है। कोई और भयानक दंड देना चाहिए।


 


सभी ने कहा बन्दर का पूंछ उसको सबसे प्यारा होता है क्यों ना तेल में कपडा डूबा कर इसकी पूंछ में बंध कर आग लगा दिया जाये। 


 


हनुमान की पूंछ पर तेल वाला कपडा बंध कर आग लगा दिया गया। 


जैसे ही पूंछ में आग लगी हनुमान जी बंधन मुक्त हो कर एक छत से दुसरे में कूदते गए और पूरी सोने की लंका में आग लगा के समुद्र की और चले गए और वहां अपनी पूंछ पर लगी आग को बुझा दिया।


 


वहां से सीधे हनुमान जी श्री राम के पास लौटे और वहां उन्होंने श्री राम को सीता माता के विषय में बताया और उनके कंगन भी दिखाए। 


 


सीता माता के निशानी को देख कर श्री राम भौवुक हो गए।


 


रामायण में सागर पर राम सेतु निर्माण


अब श्री राम और वानर सेना की चिंता का विषय था कैसे पूरी सेना समुद्र के दुसरे और जा सकेंगे। 


 


श्री राम जी ने समुद्र से निवेदन किया की वे रास्ता दें ताकि उनकी सेना समुद्र पार कर सके। 


परन्तु कई बार कहने पर भी समुद्र ने उनकी बात नहीं मानी तब राम ने लक्ष्मण से धनुष माँगा और अग्नि बाण को समुद्र पर साधा जिससे की पानी सुख जाये और वे आगे बढ़ सकें।


 


जैसे ही श्री राम ने ऐसा किया समुद्र देव डरते हुए प्रकट हुए और श्री राम से माफ़ी मांगी और कहा हे नाथ, ऐसा ना करें आपके इस बाण से मेरे में रहते वाले सभी मछलियाँ और जीवित प्राणी का अंत हो जायेगा। 


 


श्री राम ने कहा – हे समुद्र देव हमें यह बताएं की मेरी यह विशाल सेना इस समुद्र को कैसे पार कर सकते हैं। 


समुद्र देव ने उत्तर दिया – हे रघुनन्दन राम आपकी सेना में दो वानर हैं नल और नील उनके स्पर्श करके किसी भी बड़े से बड़े चीज को पानी में तैरा सकते हैं। यह कह कर समुद्र देव चले गए।


 


उनकी सलाह के अनुसार नल और नील ने पत्थर पर श्री राम के नाम लिख कर समुद्र में फैंक के देखा तो पत्थर तैरने लगा। 


 


उसके बाद एक के बाद एक करके नल नील समुद्र में पत्थर को समुद्र में फेंकते रहे और समुद्र के अगले छोर तक पहुच गए।


 


रामायण में लंका में श्री राम की वानर सेना 


श्री राम ने अपनी सेना के साथ समुद्र किनारे डेरा डाला। 


 


जब इस बात का पता रावण की पत्नी मंदोदरी को पता चला तो वो घबरा गयी और उसने रावण को बहुत समझाया पर वह नहीं समझा और सभा में चले गया।


 


रावण के भाई विभीषण ने भी रावण को सभा में समझाया और सीता माता को समान्पुर्वक श्री राम को सौंप देने के लिए कहा परन्तु यह सुन कर रावण क्रोधित हो गया और अपने ही भाई को लात मार दिया जिसके कारण विभीषण सीढियों से नीचे आ गिरे। 


 


विभीषण ने अपना राज्य छोड़ दिया और वो श्री राम के पास गए।राम ने भी ख़ुशी के साथ उन्हें स्वीकार किया और अपने डेरे में रहने की जगह दी।


 


आखरी बार श्री राम ने बाली पुत्र अंगद कुमार को भेजा पर रावण तब भी नहीं माना।


 


रामायण में अधर्म पर धर्म की विजय के लिए युद्ध 


 


श्री राम और रावण की सेना के बिच भीषण युद्ध हुआ। 


 


इस युद्ध में लक्ष्मण पर मेघनाद ने शक्ति बांण से प्रहार किया था जिसके कारण हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने के लिए हिमालय पर्वत गए। 


परन्तु वे उस पौधे को पहेचन ना सके इसलिए वे पूरा हिमालय पर्वत ही उठा लाये थे।


 


इस युद्ध में रावण की सेना के श्री राम की सेना प्रसत कर देती है और अंत में श्री राम रावण के नाभि में बाण मार कर उसे  मार देते हैं और सीता माता को छुड़ा लाते हैं।


 


श्री राम विभीषण को लंका का राजा बनाते देते हैं। 


 


श्री राम माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अपने राज्य 14वर्ष के वनवास से लौटते हैं।


 


 


उत्तर रामायण के अनुसार अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण होने के पश्चात भगवान श्रीराम ने बड़ी सभा का आयोजन कर सभी देवताओं, ऋषि-मुनियों, किन्नरों, यक्षों व राजाओं आदि को उसमें आमंत्रित किया। 


 


सभा में आए नारद मुनि के भड़काने पर एक राजन ने भरी सभा में ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर सभी को प्रणाम किया। 


ऋषि विश्वामित्र गुस्से से भर उठे और उन्होंने भगवान श्रीराम से कहा कि अगर सूर्यास्त से पूर्व श्रीराम ने उस राजा को मृत्यु दंड नहीं दिया तो वो राम को श्राप दे देंगे। 


 


 


इस पर श्रीराम ने उस राजा को सूर्यास्त से पूर्व मारने का प्रण ले लिया। 


 


श्रीराम के प्रण की खबर पाते ही राजा भागा-भागा हनुमान जी की माता अंजनी की शरण में गया तथा बिना पूरी बात बताए उनसे प्राण रक्षा का वचन मांग लिया। 


तब माता अंजनी ने हनुमान जी को राजन की प्राण रक्षा का आदेश दिया। 


हनुमान जी ने श्रीराम की शपथ लेकर कहा कि कोई भी राजन का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा परंतु जब राजन ने बताया कि भगवान श्रीराम ने ही उसका वध करने का प्रण किया है तो हनुमान जी धर्म संकट में पड़ गए कि राजन के प्राण कैसे बचाएं और माता का दिया वचन कैसे पूरा करें तथा भगवान श्रीराम को श्राप से कैसे बचाएं।


धर्म संकट में फंसे हनुमानजी को एक योजना सूझी। 


 


हनुमानजी ने राजन से सरयू नदी के तट पर जाकर राम नाम जपने के लिए कहा। हनुमान जी खुद सूक्ष्म रूप में राजन के पीछे छिप गए। 


जब राजन को खोजते हुए श्रीराम सरयू तट पर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि राजन राम-राम जप रहा है। 


 


प्रभु श्रीराम ने सोचा, “ये तो भक्त है, मैं भक्त के प्राण कैसे ले लूं”। 


 


श्री राम ने राज भवन लौटकर ऋषि विश्वामित्र से अपनी दुविधा कही। विश्वामित्र अपनी बात पर अडिग रहे और जिस पर श्रीराम को फिर से राजन के प्राण लेने हेतु सरयू तट पर लौटना पड़ा। 


 


अब श्रीराम के समक्ष भी धर्मसंकट खड़ा हो गया कि कैसे वो राम नाम जप रहे अपने ही भक्त का वध करें। 


राम सोच रहे थे कि हनुमानजी को उनके साथ होना चाहिए था परंतु हनुमानजी तो अपने ही आराध्य के विरुद्ध सूक्ष्म रूप से एक धर्मयुद्ध का संचालन कर रहे थे। 


हनुमानजी को यह ज्ञात था कि राम नाम जपते हु‌ए राजन को कोई भी नहीं मार सकता, खुद मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी नहीं।


 


श्रीराम ने सरयू तट से लौटकर राजन को मारने हेतु जब शक्ति बाण निकाला तब हनुमानजी के कहने पर राजन राम-राम जपने लगा। 


 


राम जानते थे राम-नाम जपने वाले पर शक्तिबाण असर नहीं करता। वो असहाय होकर राजभवन लौट गए। 


विश्वामित्र उन्हें लौटा देखकर श्राप देने को उतारू हो गए और राम को फिर सरयू तट पर जाना पड़ा। 


 


इस बार राजा हनुमान जी के इशारे पर जय जय सियाराम जय जय हनुमान गा रहा था। 


 


प्रभु श्री राम ने सोचा कि मेरे नाम के साथ-साथ ये राजन शक्ति और भक्ति की जय बोल रहा है। 


ऐसे में कोई अस्त्र-शस्त्र इसे मार नहीं सकता। इस संकट को देखकर श्रीराम मूर्छित हो गए। 


तब ऋषि व‌शिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र को सलाह दी कि राम को इस तरह संकट में न डालें। 


उन्होंने कहा कि श्रीराम चाह कर भी राम नाम जपने वाले को नहीं मार सकते क्योंकि जो बल राम के नाम में है और खुद राम में नहीं है। 


संकट बढ़ता देखकर ऋषि विश्वामित्र ने राम को संभाला और अपने वचन से मुक्त कर दिया। 


मामला संभलते देखकर राजा के पीछे छिपे हनुमान वापस अपने रूप में आ गए और श्रीराम के चरणों मे आ गिरे। 


 


तब प्रभु श्रीराम ने कहा कि हनुमानजी ने इस प्रसंग से सिद्ध कर दिया है कि भक्ति की शक्ति सैदेव आराध्य की ताकत बनती है तथा सच्चा भक्त सदैव भगवान से भी बड़ा रहता है। 


 


इस प्रकार हनुमानजी ने राम नाम के सहारे श्री राम को भी हरा दिया। धन्य है राम नाम और धन्य धन्य है प्रभु श्री राम के भक्त हनुमान। 


 


“जिस सागर को बिना सेतु के, लांघ सके न राम। कूद गए हनुमान जी उसी को, लेकर राम का नाम। तो अंत में निकला ये परिणाम कि राम से बड़ा राम का नाम “


 


 


वनवास यात्रा के साक्ष्य बने स्थानों की –  वहीं यदि बात यदि उनके वनवास के दिनों की घटनाओं की करें तो वहां से भी हम बहुत कुछ जान-सीख सकते है। 


 


आईए जाने भारत में स्थित उन स्थानों एवं घटनाओं के बारे में जहां श्रीराम के पावन चरण पड़े थे।


 


रामायण में केवट प्रसंग


 


वाल्मिकी रामायण के अनुसार अयोध्या का राजमहल त्यागने के बाद भगवान राम माता सीता, अनुज लक्ष्मण संग सर्वप्रथम अयोध्या से कुछ दूर मनसा नदी के समीप पहुंचे। 


 


वहां से गोमती नदी पार कर वे इलाहाबाद के समीप वेश्रंगवेपुर गये जो राजा गुह का क्षेत्र था। 


जहां उनकी भेंट केवट से हुई जिसको उन्होंने गंगा पार करवाने को कहा था। 


वर्तमान में वेश्रंगवेपुर सिगरौरी के नाम से जाना जाता है जो कि इलाहाबाद के समीप स्थित है। 


वहीं गंगा पार कर भगवान ने कुरई नामक स्थान में कुछ दिन विश्राम किया था। 


यहां एक छोटा मंदिर है जो उनके विश्रामस्थल के रूप में जाना जाता है।


 


रामायण में चित्रकुट का घाट


 


कुरई से आगे भगवान राम ‘प्रयाग’ आज के इलाहाबाद की ओर गए।


 


इलाहाबाद स्थित बहुत से स्मारक उनके वहां व्यतीत किए दिनों के साक्ष्य है। 


इसमें वाल्मीकि आश्रम, माडंव्य आश्रम, भरतकूप आदि प्रमुख है। 


विद्वानों के अनुसार यही वह स्थान है जहां उनके अनुज भरत उन्हें मनाने के लिए आए थे और श्रीराम के मना करने के बाद उनकी चरण पादुकाओं को राजसिंहासन पर रखकर अयोध्या नगरी का भार संभाला था। 


क्योंकि तब दशरथ भी स्वर्ग सिधार चुके थे।


 


रामायण में अत्रि ऋषि का आश्रम


 


 


वहां से प्रस्थान कर भगवान सतना मध्यप्रदेश पहुंचे। यहां उन्होंने अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ समय व्यतीत किया। 


 


अत्रि ऋषि अपनी पत्नी, माता अनुसूइया के साथ निवास करते थे। 


अत्रि ऋषि, माता अनुसूइया एवं उनके भक्त सभी वन के राक्षसों से काफी भयभीत रहते थे। 


श्रीराम ने उनके भय को दूर करने के लिए सभी राक्षसों का वध कर दिया।


 


रामायण में दंडकारणय


 


अत्रि ऋषि से आज्ञा लेकर भगवान ने आगे पड़ने वाले दंडकारयण ‘छतीसगढ़‘ के वनों में अपनी कुटिया बनाई। 


 


यहां के जंगल काफी घने है और आज भी यहां भगवान राम के निवास के चिन्ह मिल जाते है। 


मान्यता ये भी है कि इस वन का एक विशाल हिस्सा  भगवान राम के नाना एवं कुछ पर रावण के मित्र राक्षस वाणसुर के राज्य में पड़ता था। 


यहां प्रभु ने लम्बा समय बिताया एवं नजदीक के कई क्षेत्रों का भी भ्रमण भी किया। पन्ना, रायपुर, बस्तर, जगदलपुर में बने कई स्मारक स्थल इसके प्रतीक है। 


वहीं शहडोल, अमरकंटक के समीप स्थित सीताकुंड भी बहुत प्रसिद्ध है। यहीं पास में सीता बेंगरा एवं लक्ष्मण बेंगरा नामक दो गुफाए भी है।


 


रामायण में पंचवटी में राम


 


दंडकारणय में कुछ वर्ष व्यतीत करने के बाद प्रभु गोदावरी नदी, ‘नासिक के समीप’ स्थित पंचवटी आ गए। 


 


कहते है यहीं लक्ष्मण ने रावण की बहन शूर्पनखा की नाक काटी थी। इसके बाद यह स्थान नासिक के नाम से प्रसिद्ध हो गया। 


‘संस्कृत में नाक को नासिक कहते है।‘ जबकि पंचवटी का नाम गोदावरी के तट पर लगाए गए पांच वृक्ष पीपल, बरगद, आवला, बेल तथा अशोक के नाम पर पड़ा। 


मान्यता है कि ये सभी वृक्ष राम- सीता, लक्ष्मण ने लगाए थे। राम-लक्ष्मण ने यहीं खर-दूषण साथ युद्ध किया था। साथ ही मारीच वध भी इसी क्षेत्र में हुआ था।


 


रामायण में सीताहरण का स्थान


 


नासिक से लगभग 60 किलोमीटर दूर स्थित ताकड़े गांव के बारे में मान्यता है कि इसी स्थान के समीप भगवान की कुटिया थी जहां से रावण ने माता सीता का हरण किया था।  


 


इसके पास ही जटायु एवं रावण के बीच युद्ध भी हुआ था एवं मृत्युपूर्व जटायु ने यहीं राम को सीताहरण के बारे में बताया था। 


यह स्थान सर्वतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। 


जबकि आंध्रप्रदेश के खम्मम के बारें में कई लोगो की मान्यता है कि राम-सीता की कुटिया यहां थी।


 


रामायण में शबरी को दर्शन


 


जटायु के अंतिम सस्कार के बाद राम-लक्ष्मण सीता की खोज में ऋष्यमूक पर्वत की ओर गए। 


 


रास्ते में वे पम्पा नदी के समीप शबरी की कुटिया में पहुंचे। 


भगवान राम के शबरी से हुई भेंट से भला कौन परिचित नहीं है। 


पम्पा नदी केरल में है प्रसिद्द सबरीमला मंदिर इसके तट पर बना हुआ है।


 


रामायण में हनुमान से भेंट


 


घने चंदन के वनों को पार करते हुए जब भगवान ऋष्यमूक पर्वत पर पहुंचे तब वहां उन्हें सीता के आभूषण मिले एवं हनुमान से भेंट हुई। 


 


यहीं समीप में उन्होंने बाली का वध किया था यह स्थान कर्णाटक के हम्मी, बैल्लारी क्षेत्र में स्थित है। 


पहाड़ के नीचे श्रीराम का एक मंदिर है एवं नजदीक स्थित पहाड़ के बारें मान्यता है कि वहां मतंग ऋषि का आश्रम था इसलिए पहाड़ का मतंग पर्वत है।


 


रामायण में सेना का गठन


 


हनुमान एवं सुग्रीव से मित्रता के बाद राम ने अपनी सेना का गठन किया एवं किष्किन्धा ‘कर्णाटक’ से प्रस्थान किया। 


 


मार्ग में कई वनों, नदियों को पार करते हुए वो रामेश्वरम पहुंचे। यहां उन्होंने युद्ध में विजय के लिए भगवान शिव की पूजा की। 


रामेश्वरम में तीन दिनों के प्रयास के बाद भगवान ने उस स्थान का पता लगवा लिया जहां से आसानी से लंका जाया जा सकता था। 


फिर अपनी सेना के वानर नल-नील की सहायता से उस स्थान पर रामसेतु का निर्माण करवाया।


 


रामायण में नुवारा एलिया पर्वत श्रृंख्ला


 


 


 


मान्यताओं के अनुसार हनुमान द्वारा सर्वप्रथम लंका जाने के बाद जिस स्थान का ज्ञान हुआ। 


 


वो लंका संमुद्र से घिरी नुवारा एलिया पर्वत श्रृंख्ला थी जिस पर रावण की लंका बसी हुई थी। 


यहीं रावण के साम्राज्य को समाप्त कर राम ने 72 दिन चले युद्ध के बाद सीता को रावण की लंका से मुक्त कराया था।


 


 


 


 


 


 


 


रामायण से जुड़े 13 रहस्य जिनसे दुनिया अभी भी अनजान है


 


भगवान राम और देवी सीता के जन्म एवं जीवनयात्रा का वर्णन जिस महाकाव्य में किया गया है उसे रामायण के नाम से जाना जाता हैl 



हालांकि ऐसा माना जाता है कि मूल रामायण की रचना “ऋषि वाल्मीकि” द्वारा किया गया था, लेकिन कई अन्य संतों और वेद पंडितों जैसे- तुलसीदास, संत एकनाथ आदि ने इसके अन्य संस्करणों की भी रचना की हैl 



हालांकि प्रत्येक संस्करण में अलग-अलग तरीके से कहानी का वर्णन किया गया है, लेकिन मूल रूपरेखा एक ही हैl ऐसा माना जाता है कि रामायण की घटना 4थी और 5वीं शताब्दी ई.पू. की हैl


 


हम में से अधिकांश लोगों को रामायण की कहानी पता है, लेकिन इस महाकाव्य से जुड़े कुछ ऐसे भी रहस्य हैं, जिनके बारे में लोगों को पता नहीं हैl आज हम आपके सामने रामायण से जुड़े ऐसे ही 13 रहस्यों को उजागर कर रहे हैं:


 


 रामायण के हर 1000 श्लोक के बाद आने वाले पहले अक्षर से गायत्री मंत्र बनता है


 


गायत्री मंत्र में 24 अक्षर होते हैं और वाल्मीकि रामायण में 24,000 श्लोक हैंl 



रामायण के हर 1000 श्लोक के बाद आने वाले पहले अक्षर से गायत्री मंत्र बनता हैl यह मंत्र इस पवित्र महाकाव्य का सार हैl गायत्री मंत्र को सर्वप्रथम ऋग्वेद में उल्लिखित किया गया हैl


 


2.  राम और उनके भाइयों के अलावा राजा दशरथ एक पुत्री के भी पिता थे श्रीराम के माता-पिता एवं भाइयों के बारे में तो प्रायः सभी जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि राम की एक बहन भी थीं, जिनका नाम “शांता” थाl वे आयु में चारों भाईयों से काफी बड़ी थींl 



उनकी माता कौशल्या थींl ऐसी मान्यता है कि एक बार अंगदेश के राजा रोमपद और उनकी रानी वर्षिणी अयोध्या आएl 



उनको कोई संतान नहीं थीl बातचीत के दौरान राजा दशरथ को जब यह बात मालूम हुई तो उन्होंने कहा, मैं अपनी बेटी शांता आपको संतान के रूप में दूंगाl यह सुनकर रोमपद और वर्षिणी बहुत खुश हुएl 



उन्होंने बहुत स्नेह से उसका पालन-पोषण किया और माता-पिता के सभी कर्तव्य निभाएl


 


एक दिन राजा रोमपद अपनी पुत्री से बातें कर रहे थे, उसी समय द्वार पर एक ब्राह्मण आए और उन्होंने राजा से प्रार्थना की कि वर्षा के दिनों में वे खेतों की जुताई में राज दरबार की ओर से मदद प्रदान करेंl


 


राजा को यह सुनाई नहीं दिया और वे पुत्री के साथ बातचीत करते रहेl द्वार पर आए नागरिक की याचना न सुनने से ब्राह्मण को दुख हुआ और वे राजा रोमपद का राज्य छोड़कर चले गएl 



वह ब्राह्मण इन्द्र के भक्त थेl अपने भक्त की ऐसी अनदेखी पर इन्द्र देव राजा रोमपद पर क्रुद्ध हुए और उन्होंने उनके राज्य में पर्याप्त वर्षा नहीं कीl 



इससे खेतों में खड़ी फसलें मुरझाने लगीl


 


इस संकट की घड़ी में राजा रोमपद ऋष्यशृंग ऋषि के पास गए और उनसे उपाय पूछाl ऋषि ने बताया कि वे इन्द्रदेव को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करेंl 



ऋषि ने यज्ञ किया और खेत-खलिहान पानी से भर गएl इसके बाद ऋष्यशृंग ऋषि का विवाह शांता से हो गया और वे सुखपूर्वक रहने लगेl बाद में ऋष्यशृंग ने ही दशरथ की पुत्र कामना के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया थाl


 


जिस स्थान पर उन्होंने यह यज्ञ करवाया था, वह अयोध्या से लगभग 39 कि.मी. पूर्व में था और वहाँ आज भी उनका आश्रम है और उनकी तथा उनकी पत्नी की समाधियाँ हैंल


 


3. राम विष्णु के अवतार हैं लेकिन उनके अन्य भाई किसके अवतार थे


 


राम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है लेकिन आपको पता है कि उनके अन्य भाई किसके अवतार थे? लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार माना जाता है जो क्षीरसागर में भगवान विष्णु का आसन हैl


 


जबकि भरत और शत्रुघ्न को क्रमशः भगवान विष्णु द्वारा हाथों में धारण किए गए सुदर्शन-चक्र और शंख-शैल का अवतार माना जाता हैल


 


4. सीता स्वयंवर में प्रयुक्त भगवान शिव के धनुष का नाम


 


हम में से अधिकांश लोगों को पता है कि राम का सीता से विवाह एक स्वयंवर के माध्यम से हुआ थाl उस स्वंयवर के लिए भगवान शिव के धनुष का इस्तेमाल किया गया था, जिस पर सभी राजकुमारों को प्रत्यंचा चढ़ाना थाl लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि भगवान शिव के उस धनुष का नाम “पिनाक” थाल


 


5. लक्ष्मण को “गुदाकेश” के नाम से भी जाना जाता है


 


ऐसा माना जाता है कि वनवास के 14 वर्षों के दौरान अपने भाई और भाभी की रक्षा करने के उद्देश्य से लक्ष्मण कभी सोते नहीं थेl इसके कारण उन्हें “गुदाकेश” के नाम से भी जाना जाता हैl व



नवास की पहली रात को जब राम और सीता सो रहे थे तो निद्रा देवी लक्ष्मण के सामने प्रकट हुईंl उस समय लक्ष्मण ने निद्रा देवी से अनुरोध किया कि उन्हें ऐसा वरदान दें कि वनवास के 14 वर्षों के दौरान उन्हें नींद ना आए और वह अपने प्रिय भाई और भाभी की रक्षा कर सकेl


 


निद्रा देवी इस बात पर प्रसन्न होकर बोली कि अगर कोई तुम्हारे बदले 14 वर्षों तक सोए तो तुम्हें यह वरदान प्राप्त हो सकता हैl 



इसके बाद लक्ष्मण की सलाह पर निद्रा देवी लक्ष्मण की पत्नी और सीता की बहन “उर्मिला” के पास पहुंचीl उर्मिला ने लक्ष्मण के बदले सोना स्वीकार कर लिया और पूरे 14 वर्षों तक सोती रहील


 


6. उस जंगल का नाम जहाँ राम, लक्ष्मण और सीता वनवास के दौरान रूके थे


 


रामायण महाकाव्य की कहानी के बारे में हम सभी जानते हैं कि राम और सीता, लक्ष्मण के साथ 14 वर्षों के लिए वनवास गए थे और राक्षसों के राजा रावण को हराकर वापस अपने राज्य लौटे थेl 



हम में से अधिकांश लोगों को पता है कि राम, लक्ष्मण और सीता ने कई साल वन में बिताए थे, लेकिन कुछ ही लोगों को उस वन के नाम की जानकारी होगीl


 


उस वन का नाम दंडकारण्य था जिसमें राम, सीता और लक्ष्मण ने अपना वनवास बिताया थाl यह वन लगभग 35,600 वर्ग मील में फैला हुआ था जिसमें वर्तमान छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश के कुछ हिस्से शामिल थेl 



उस समय यह वन सबसे भयंकर राक्षसों का घर माना जाता थाl इसलिए इसका नाम दंडकारण्य था जहाँ “दंड” का अर्थ “सजा देना” और “अरण्य” का अर्थ “वन” है।


 


7. लक्ष्मण रेखा प्रकरण का वर्णन वाल्मीकि रामायण में नहीं है


 


पूरे रामायण की कहानी में सबसे पेचीदा प्रकरण लक्ष्मण रेखा प्रकरण है, जिसमें लक्ष्मण वन में अपनी झोपड़ी के चारों ओर एक रेखा खींचते हैंl 



जब सीता के अनुरोध पर राम हिरण को पकड़ने और मारने की कोशिश करते हैं, तो वह हिरण राक्षस मारीच का रूप ले लेता हैl 



मरने के समय में मारीच राम की आवाज में लक्ष्मण और सीता के लिए रोता हैl यह सुनकर सीता लक्ष्मण से आग्रह करती है कि वह अपने भाई की मदद के लिए जाए क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि उनके भाई किसी मुसीबत में फंस गए हैंl


 


पहले तो लक्ष्मण सीता को अकेले जंगल में छोड़कर जाने को राजी नहीं हुए लेकिन बार-बार सीता द्वारा अनुरोध करने पर वह तैयार हो गएl 



इसके बाद लक्ष्मण ने झोपड़ी के चारों ओर एक रेखा खींची और सीता से अनुरोध किया कि वह रेखा के अन्दर ही रहे और यदि कोई बाहरी व्यक्ति इस रेखा को पार करने की कोशिश करेगा तो वह जल कर भस्म हो जाएगाl


 


इस प्रकरण के संबंध में अज्ञात तथ्य यह है कि इस कहानी का वर्णन ना तो “वाल्मीकि रामायण” में है और ना ही “रामचरितमानस” में हैl 



लेकिन रामचरितमानस के लंका कांड में इस बात का उल्लेख रावण की पत्नी मंदोदरी द्वारा किया गया है


 


8. रावण एक उत्कृष्ट वीणा वादक था


 


रावण सभी राक्षसों का राजा थाl बचपन में वह सभी लोगों से डरता था क्योंकि उसके दस सिर थेl भगवान शिव के प्रति उसकी दृढ़ आस्था थीl 



इस बात की पुख्ता जानकारी है कि रावण एक बहुत बड़ा विद्वान था और उसने वेदों का अध्ययन किया थाl लेकिन क्या आपको पता है कि रावण के ध्वज में प्रतीक के रूप में वीणा होने का कारण क्या था?


 


चूंकि रावण एक उत्कृष्ट वीणा वादक था जिसके कारण उसके ध्वज में प्रतीक के रूप में वीणा अंकित थाl हालांकि रावण इस कला को ज्यादा तवज्जो नहीं देता था लेकिन उसे यह यंत्र बजाना पसन्द थाl 


 


9. इन्द्र के ईर्ष्यालु होने के कारण “कुम्भकर्ण” को सोने का वरदान प्राप्त हुआ था  


 


रामायण में एक दिलचस्प कहानी हमेशा सोने वाले “कुम्भकर्ण” की हैl 



कुम्भकर्ण, रावण का छोटा भाई था, जिसका शरीर बहुत ही विकराल थाl इसके अलावा वह पेटू (बहुत अधिक खाने वाला) भी थाl रामायण में वर्णित है कि कुम्भकर्ण लगातार छह महीनों तक सोता रहता था और फिर सिर्फ एक दिन खाने के लिए उठता था और पुनः छह महीनों तक सोता रहता थाl


 


लेकिन क्या आपको पता है कि कुम्भकर्ण को सोने की आदत कैसे लगी थीl एक बार एक यज्ञ की समाप्ति पर प्रजापति ब्रह्मा कुन्भकर्ण के सामने प्रकट हुए और उन्होंने कुम्भकर्ण से वरदान मांगने को कहाl


 


इन्द्र को इस बात से डर लगा कि कहीं कुम्भकर्ण वरदान में इन्द्रासन न मांग ले, अतः उन्होंने देवी सरस्वती से अनुरोध किया कि वह कुम्भकर्ण की जिह्वा पर बैठ जाएं जिससे वह “इन्द्रासन” के बदले “निद्रासन” मांग लेl इस प्रकार इन्द्र की ईर्ष्या की वजह से कुम्भकर्ण को सोने का वरदान प्राप्त हुआ था


 


10. नासा के अनुसार “रामायण” की कहानी और “आदम का पुल” एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं 


 


रामायण की कहानी के अंतिम चरण में वर्णित है कि राम और लक्ष्मण ने वानर सेना की मदद से लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए एक पुल का निर्माण किया थाl


 


ऐसा माना जाता है कि यह कहानी लगभग 1,750,000 साल पहले की हैl


 


हाल ही में नासा ने पाक जलडमरूमध्य में श्रीलंका और भारत को जोड़ने वाले एक मानव निर्मित प्राचीन पुल की खोज की है और शोधकर्ताओं और पुरातत्वविदों के अनुसार इस पुल के निर्माण की अवधि रामायण महाकाव्य में वर्णित पुल के निर्माणकाल से मिलती हैl


 


नासा के उपग्रहों द्वारा खोजे गए इस पुल को “आदम का पुल” कहा जाता है और इसकी लम्बाई लगभग 30 किलोमीटर है 


 



 


 


 


 


11. रावण को पता था कि वह राम के हाथों मारा जाएगा


 


रामायण की पूरी कहानी पढ़ने के बाद हमें पता चलता है कि रावण एक क्रूर और सबसे विकराल राक्षस था, जिससे सभी लोग घृणा करते थेl 



जब रावण के भाइयों ने सीता के अपहरण की वजह से राम के हमले के बारे में सुना तो अपने भाई को आत्मसमर्पण करने की सलाह दी थीl 



यह सुनकर रावण ने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया और राम के हाथों मरकर मोक्ष पाने की इच्छा प्रकट कीl उसके कहा कि “अगर राम और लक्ष्मण दो सामान्य इंसान हैं, तो सीता मेरे पास ही रहेगी क्योंकि मैं आसानी से उन दोनों को परास्त कर दूंगा और यदि वे देवता हैं तो मैं उन दोनों के हाथों मरकर मोक्ष प्राप्त करूँगाl


 


12. आखिर क्यों राम ने लक्ष्मण को मृत्युदंड दिया


 


रामायण में वर्णित है कि श्री राम ने न चाहते हुए भी जान से प्यारे अपने छोटे भाई लक्ष्मण को मृत्युदंड दिया थाl आखिर क्यों भगवान राम ने लक्ष्मण को मृत्युदंड दिया था? 



यह घटना उस वक़्त की है जब श्री राम लंका विजय के बाद अयोध्या लौट आये थे और अयोध्या के राजा बन गए थेl एक दिन यम देवता कोई महत्तवपूर्ण चर्चा करने के लिए श्री राम के पास आते हैंl 



चर्चा प्रारम्भ करने से पूर्व उन्होंने भगवान राम से कहा की आप मुझे वचन दें कि जब तक मेरे और आपके बीच वार्तालाप होगी हमारे बीच कोई नहीं आएगा और जो आएगा, उसे आप मृत्युदंड देंगेंl 



इसके बाद राम, लक्ष्मण को यह कहते हुए द्वारपाल नियुक्त कर देते हैं कि जब तक उनकी और यम की बात हो रही है वो किसी को भी अंदर न आने दे, अन्यथा वह उसे मृत्युदंड दे देंगेl


 


लक्ष्मण भाई की आज्ञा मानकर द्वारपाल बनकर खड़े हो जाते हैंl लक्ष्मण को द्वारपाल बने कुछ ही समय बीतने के बाद वहां पर ऋषि दुर्वासा का आगमन होता हैl 



जब दुर्वासा ने लक्ष्मण से अपने आगमन के बारे में राम को जानकारी देने के लिये कहा तो लक्ष्मण ने विनम्रता के साथ मना कर दियाl 



इस पर दुर्वासा क्रोधित हो गये तथा उन्होने सम्पूर्ण अयोध्या को श्राप देने की बात कहीl लक्ष्मण ने शीघ्र ही यह निश्चय कर लिया कि उनको स्वयं का बलिदान देना होगा ताकि वो नगरवासियों को ऋषि के श्राप से बचा सकें और उन्होने भीतर जाकर ऋषि दुर्वासा के आगमन की सूचना दीl


 


अब श्री राम दुविधा में पड़ गए क्योंकि उन्हें अपने वचन के अनुसार लक्ष्मण को मृत्युदंड देना थाl 



इस दुविधा की स्थिति में श्री राम ने अपने गुरू वशिष्ठ का स्मरण किया और कोई रास्ता दिखाने को कहाl गुरूदेव ने कहा कि अपनी किसी प्रिय वस्तु का त्याग, उसकी मृत्यु के समान ही हैl 



अतः तुम अपने वचन का पालन करने के लिए लक्ष्मण का त्याग कर दोl लेकिन जैसे ही लक्ष्मण ने यह सुना तो उन्होंने राम से कहा की आप भूल कर भी मेरा त्याग नहीं करना, आप से दूर रहने से तो यह अच्छा है की मैं आपके वचन का पालन करते हुए मृत्यु को गले लगा लूँl ऐसा कहकर लक्ष्मण ने जल समाधि ले लीl


 


13. राम ने सरयू नदी में डूबकी लगाकर पृथ्वीलोक का परित्याग किया था 


 


ऐसा माना जाता है कि जब सीता ने पृथ्वी के अन्दर समाहित होकर अपने शरीर का परित्याग कर दिया तो उसके बाद राम ने सरयू नदी में जल समाधि लेकर पृथ्वीलोक का परित्याग किया था|


 


 


14.सीता के परित्याग के बाद जब राजा राम चंद्र लक्ष्मण के साथ मिथिला जाते है तो उनके स्वागत के लिए सीता माता की बाल सखी चन्द्रप्रभा अतिथि स्वागत के लिए द्वार पर खड़ी होती है और राजा राम चंद्र को देखकर मुँह फेर लेती है और अपना रोष परकत करती है !


 


दूसरे दिन जब सीता जी की माता का आदेश लेकर जब राजा राम जी को सुनाने जाती है तब रामचंद्र उनसे मुँह फेरने का कारन पूछते है और जो भी उसके दिल में है उसको कहने को कहते है |


 


चंद्रप्रभा दुखी मन से कहती है अयोध्या ने मिथिला के बेटी सीता के साथ जो किया इस कारण से वह मिथिला के सभी दीवारों पर लिख देगी कि मिथिला वालो अब कभी अयोध्या अपनी बेटी ना व्याहना 


 


 


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अब पछताये होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत* Khani !!

 *अब पछताये होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत*



एक परिवार था | जिनके पास बहुत बीघा जमीन थी | घर में चार लड़के थे | चारों खेत में मेहनत मजदूरी करके कमाते थे | परिवार बहुत बड़ा था जितना वे मेहनत करते, उतना उन्हें मिलता ना था क्यूंकि खेत में पानी की कमी थी और मौसम की मार पड़ती ही जा रही थी | जिसके कारण खाने तक के लाले थे तो बच्चो की पढाई तो दूर की बात हैं | अगर इस बीच कोई बीमार हो जाए तो गरीबी में आटा गीला जैसी बात हो जायें | परिवार बहुत बड़ा था जिस कारण आपसी लड़ाईया भी बढ़ती जा रही थी वैचारिक मतभेद था सभी अपने खेत के लिए कुछ अलग करके कमाना चाहते थे | जिसे देखकर परिवार के मुखियाँ ने खेत को चार बराबर हिस्सों में बाँट दिया और सभी भाईयों को अपने- अपने परिवार की ज़िम्मेदारी सौंप दी ताकि जिसे जो बेहतर लगे वो करे |

अकाल की स्थिती थी | ऐसे में चारो परिवार दुखी थे | तब ही एक उद्योगपति गाँव में आया | उसने इन चारो भाईयों के सामने एक प्रस्ताव रखा जिसमे उसने इनकी जमीन मांगी और बदले में जमीन की कीमत के साथ परिवार के जो भी सदस्य काम करना चाहते हैं उन्हें नौकरी का वादा किया |
दुसरे दिन, छोटे भाई ने सभी को विस्तार से पूरी बात बताई | और कहा कि वो इस प्रस्ताव के लिए तैयार हैं लेकिन बड़े दोनों भाईयों ने इन्कार कर दिया | उन दोनों ने कहा यह पुश्तैनी जमीन हैं | हमारी पूज्यनीय हैं | भूखे मर जायेंगे लेकिन हम जमीन ना देंगे | छोटे भाई ने बहुत समझाया लेकिन वे नहीं माने |
कुछ दिनों बाद, उद्योगपति ने यह प्रस्ताव अन्य खेत के मालिक को दिया | उन लोगो ने विकट परिस्थितियों एवम बच्चो के भविष्य को देखते हुए, प्रस्ताव स्वीकार कर लिया |
कुछ समय बाद, उस जमीन पर एक उद्योग बना | जहाँ कई ग्राम वासियों को नौकरी मिली | साथ ही उस जमीन मालिक को जमीन की कीमत और उसके बच्चो को नौकरी भी मिली | जिससे उन लोगो ने अपना अन्य कारोबार भी शुरू किया और दुसरे शहरों में जमीन भी खरीदी | और उनका जीवन सुधार गया |उन्होंने एक बड़ा सा बंगला बनाया | जिसमे बाग़ को सम्भालने का काम वो चारो करते थे जिन्हें पहले उद्योग का प्रस्ताव मिला था |

एक दिन वो उद्योगपति उस घर में आया और उसने इन चारों को देख कर पहचान लिया और पूछा कैसा चल रहा हैं ? तब सिर झुकारक कहा साहूकार का कर्ज बढ़ गया था जमीन हाथ से चली गई अब मजदुर और बाग़ का काम करते हैं | उद्योगपति ने कहा- अगर आप मान लेते तो यह दशा ना होती |  उस पर छोटे भाई ने करुण स्वर में कहा – अब पछताये होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गई खेत |

*शिक्षा:-*
वक्त रहते फैसला ना लेने पर बाद में पछतावा करने का कोई लाभ नहीं होता | माना कि भूमि से भावनायें जुडी हैं जो पूर्वजों की अमानत हैं लेकिन पूर्वजो की अमानत के लिए वर्तमान और भविष्य को ख़त्म कर देना कहाँ तक सही हैं |

आपके सामने आपके बच्चे अनपढ़ हैं भूख से मर रहे हैं फिर भी आप जमीन के मोह मे हैं |

शायद मैं गलत हूँ पर मैं अपनों को इस हालत में नहीं देख सकती | आज के दौर में पैसा जरुरी हैं | इस तरह का फैसला गैरकानूनी काम नहीं हैं | कल को आपके बच्चे पेट भरने के लिए चौरी डकैती करेंगे तो क्या आपके पूर्वजो को शांति मिलेगी ?



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Friday, December 16, 2022

Reodar (sirohi) pine code sbhi chetr

Reodar पिन कोड

भारत में 29 राज्य हैं जिनमें से कम से कम 720 जिले हैं जिनमें लगभग 6 लाख गाँव हैं, और 8200 से अधिक शहर और कस्बे हैं।  भारतीय डाक विभाग ने डाक सेवाओं की तुरंत सूचना देने के लिए प्रत्येक जिले/गाँव/कस्बे/शहर को तीन डाक कोड दिया है।

पोस्टल नंबर या पिन या पिन कोड पोस्ट ऑफिस नंबरिंग या पोस्ट कोड सिस्टम में एक कोड है, जिसका उपयोग भारतीय पोस्ट, भारतीय डाक प्रशासन द्वारा किया जाता है।  कोड छह सूत्री होता है।

पिन के पहले तीन अंक एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसे एक नेटवर्क मार्केटिंग कहा जाता है जिसका मुख्यालय सबसे बड़े शहर के मुख्य डाक्यूमेंट में होता है और इसे विश्वसनीयता कार्यालय के रूप में जाना जाता है।  संभाले गए मेल की मात्रा के आधार पर एक राज्य में एक या एक से अधिक ग्रन्थीकरण जिले हो सकते हैं।  चौथा अंक उस मार्ग का प्रतिनिधित्व करता है जिस पर छँटाई जिले में वितरण कार्यालय स्थित है।  अंतिम दो अंक 01 से शुरू होने वाले छँटाई जिले में वितरण कार्यालय का प्रतिनिधित्व करते हैं जो GPO या HO होंगे।

रिओदर  पिन कोड  307514  है।  पिन कोड को विभिन्न कोड या पोस्टल कोड के रूप में भी जाना जाता है।  रेओदर  जिला  सिरोही  ,  राजस्थान, भारत में स्थित है।

कार्यालयReodar
पिन कोड307514
तालुकReodar
विभाजनसिरोही
जिलासिरोही
क्षेत्रजोधपुर
कॉर्डाराजस्थान राजस्थान
राज्यराजस्थान राजस्थान
देशइंडिया
टेलीफोन नंबर।0295-223405
कार्यालय का प्रकारइसलिए
वितरण की स्थितिवितरण
संबंधित उप कार्यालयना
संबंधित प्रधान कार्यालयसरोही हो

Reodar निकट पिन कोड सूची द्वारा

  • स्थान
  • पिन कोड
  • तालुक
अस्वीकरण: यहां दी गई जानकारी भारतीय डाक  से उपलब्ध नवीनतम और अपडेट है  , लेकिन उपयोगकर्ता को सलाह दी जाती है कि वे प्रदान की गई जानकारी का उपयोग करने से पहले संबंधित ब्लॉग से जानकारी लें।  वेबसाइट या लेखक द्वारा प्रदान की गई जानकारी सामयिकता, शुद्धता, पूर्णता या गुणवत्ता के लिए नहीं है।  प्रदान की गई जानकारी के उपयोग के कारण होने वाली क्षति के संबंध में किसी भी संबंध का दावा इसलिए खारिज कर दिया जाएगा।