Thursday, March 16, 2023

कबीर के दोहे (1 - 100) Hindi poetry

 


कबीर के दोहे (1-100)

( 1 - 100 )

 कबीर के दोहे
  

(1 )
दुख में सुमरिन सब करेसुख मे करे न कोय ।
जो सुख मे सुमरिन करेदुख काहे को होय ॥
( 2 )
माला फेरत जुग भयाफिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार देंमन का मनका फेर 
(3 )
गुरु गोविन्द दोनों खड़ेकाके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनोगोविंद दियो बताय ॥
(4 )
बलिहारी गुरु आपनोघड़ी-घड़ी सौ सौ बार ।
मानुष से देवत किया करत न लागी बार ॥
(5 )
कबिरा माला मनहि कीऔर संसारी भीख ।
माला फेरे हरि मिलेगले रहट के देख ॥
(6 )
सुख मे सुमिरन ना कियादु:ख में किया याद ।
कह कबीर ता दास कीकौन सुने फरियाद ॥
(7) 
साईं इतना दीजियेजा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँसाधु ना भूखा जाय 
(8)
लूट सके तो लूट लेराम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगेप्राण जाहिं जब छूट 
(9)
जाति न पूछो साधु कीपूछि लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तलवार कापड़ा रहन दो म्यान ॥
(10)
जहाँ दया तहाँ धर्म हैजहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप हैजहाँ क्षमा तहाँ आप ॥

(11 )
धीरे-धीरे रे मनाधीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ाॠतु आए फल होय ॥
 (12)
कबीरा ते नर अन्ध हैगुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर हैगुरु रुठै नहीं ठौर ॥
(13)
पाँच पहर धन्धे गयातीन पहर गया सोय ।
एक पहर हरि नाम बिनमुक्ति कैसे होय 
(14 
कबीरा सोया क्या करेउठि न भजे भगवान ।
जम जब घर ले जायेंगेपड़ी रहेगी म्यान ॥
(15 )
शीलवन्त सबसे बड़ासब रतनन की खान ।
तीन लोक की सम्पदारही शील में आन ॥
(16 )
माया मरी न मन मरामर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरीकह गए दास कबीर ॥
(17 )
माटी कहे कुम्हार सेतु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगामैं रौंदूंगी तोय ॥
(18 )
तिनका कबहुँ न निंदियेजो पाँयन तर होय ।
    कबहुँ उड़ आँखिन परेपीर घनेरी होय  
  
रात गंवाई सोय केदिवस गंवाया खाय ।
हीना जन्म अनमोल थाकोड़ी बदले जाय ॥ 19 

नींद निशानी मौत कीउठ कबीरा जाग ।
और रसायन छांड़ि केनाम रसायन लाग ॥ 20 

जो तोकु कांटा बुवेताहि बोय तू फूल ।
तोकू फूल के फूल हैबाकू है त्रिशूल ॥ 21 

दुर्लभ मानुष जन्म हैदेह न बारम्बार ।
तरुवर ज्यों पत्ती झड़ेबहुरि न लागे डार ॥ 22 


आय हैं सो जाएँगेराजा रंक फकीर ।
एक सिंहासन चढ़ि चलेएक बँधे जात जंजीर ॥ 23 
 
काल करे सो आज करआज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगीबहुरि करेगा कब ॥ 24 

माँगन मरण समान हैमति माँगो कोई भीख ।
माँगन से तो मरना भलायह सतगुरु की सीख ॥ 25 
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जहाँ आपा तहाँ आपदांजहाँ संशय तहाँ रोग ।
कह कबीर यह क्यों मिटेचारों धीरज रोग ॥ 26 

माया छाया एक सीबिरला जाने कोय ।
भगता के पीछे लगेसम्मुख भागे सोय ॥ 27 

आया था किस काम कोतु सोया चादर तान ।
सुरत सम्भाल ए गाफिलअपना आप पहचान ॥ 28 

क्या भरोसा देह काबिनस जात छिन मांह ।
साँस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह ॥ 29 

गारी ही सों ऊपजेकलह कष्ट और मींच ।
हारि चले सो साधु हैलागि चले सो नींच ॥ 30 
दुर्बल को न सताइएजाकि मोटी हाय ।
बिना जीव की हाय सेलोहा भस्म हो जाय ॥ 31 
दान दिए धन ना  घटे नदी ने घटे नीर ।
अपनी आँखों देख लोयों क्या कहे कबीर ॥ 32 
दस द्वारे का पिंजरातामे पंछी का कौन ।
रहे को अचरज हैगए अचम्भा कौन ॥ 33 
ऐसी वाणी बोलेएमन का आपा खोय ।
औरन को शीतल करेआपहु शीतल होय ॥ 34 
हीरा वहाँ न खोलियेजहाँ कुंजड़ों की हाट ।
बांधो चुप की पोटरीलागहु अपनी बाट ॥ 35 
कुटिल वचन सबसे बुराजारि कर तन हार ।
साधु वचन जल रूपबरसे अमृत धार ॥ 36 
जग में बैरी कोई नहींजो मन शीतल होय ।
यह आपा तो ड़ाल देदया करे सब कोय ॥ 37 
मैं रोऊँ जब जगत कोमोको रोवे न होय ।
मोको रोबे सोचनाजो शब्द बोय की होय ॥ 38 
सोवा साधु जगाइएकरे नाम का जाप ।
यह तीनों सोते भलेसाकित सिंह और साँप ॥ 39 
अवगुन कहूँ शराब काआपा अहमक साथ ।
मानुष से पशुआ करे दायगाँठ से खात ॥ 40 
बाजीगर का बांदराऐसा जीव मन के साथ ।
नाना नाच दिखाय करराखे अपने साथ ॥ 41 
अटकी भाल शरीर में तीर रहा है टूट ।
चुम्बक बिना निकले नहीं कोटि पटन को फ़ूट ॥ 42 
कबीरा जपना काठ कीक्या दिख्लावे मोय ।
ह्रदय नाम न जपेगायह जपनी क्या होय ॥ 43 
पतिवृता मैलीकाली कुचल कुरूप ।
पतिवृता के रूप परवारो कोटि सरूप ॥ 44 

बैध मुआ रोगी मुआमुआ सकल संसार ।
एक कबीरा ना मुआजेहि के राम अधार ॥ 45 
हर चाले तो मानवबेहद चले सो साध ।
हद बेहद दोनों तजेताको भता अगाध ॥ 46 
राम रहे बन भीतरे गुरु की पूजा ना आस ।
रहे कबीर पाखण्ड सबझूठे सदा निराश ॥ 47 
जाके जिव्या बन्धन नहींह्र्दय में नहीं साँच ।
वाके संग न लागियेखाले वटिया काँच ॥ 48 
तीरथ गये ते एक फलसन्त मिले फल चार ।
सत्गुरु मिले अनेक फलकहें कबीर विचार ॥ 49 
सुमरण से मन लाइएजैसे पानी बिन मीन ।
प्राण तजे बिन बिछड़ेसन्त कबीर कह दीन ॥ 50 


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समझाये समझे नहींपर के साथ बिकाय ।
मैं खींचत हूँ आपकेतू चला जमपुर जाए ॥ 51 


हंसा मोती विण्न्याकुञ्च्न थार भराय ।
जो जन मार्ग न जानेसो तिस कहा कराय ॥ 52 
कहना सो कह दियाअब कुछ कहा न जाय ।
एक रहा दूजा गयादरिया लहर समाय ॥ 53 
वस्तु है ग्राहक नहींवस्तु सागर अनमोल ।
बिना करम का मानवफिरैं डांवाडोल ॥ 54 
कली खोटा जग आंधराशब्द न माने कोय ।
चाहे कहँ सत आइनाजो जग बैरी होय ॥ 55 
कामीक्रोधीलालचीइनसे भक्ति न होय ।
भक्ति करे कोइ सूरमाजाति वरन कुल खोय ॥ 56 
जागन में सोवन करेसाधन में लौ लाय ।
सूरत डोर लागी रहेतार टूट नाहिं जाय ॥ 57 
साधु ऐसा चहिए ,जैसा सूप सुभाय ।
सार-सार को गहि रहेथोथ देइ उड़ाय ॥ 58 
लगी लग्न छूटे नाहिंजीभ चोंच जरि जाय ।
मीठा कहा अंगार मेंजाहि चकोर चबाय ॥ 59 
भक्ति गेंद चौगान कीभावे कोई ले जाय ।
कह कबीर कुछ भेद नाहिंकहां रंक कहां राय ॥ 60 
घट का परदा खोलकरसन्मुख दे दीदार ।
बाल सनेही सांइयाँआवा अन्त का यार ॥ 61 
अन्तर्यामी एक तुमआत्मा के आधार ।
जो तुम छोड़ो हाथ तोकौन उतारे पार ॥ 62 
मैं अपराधी जन्म कानख-सिख भरा विकार ।
तुम दाता दु:ख भंजनामेरी करो सम्हार ॥ 63 
प्रेम न बड़ी ऊपजैप्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-प्रजा जोहि रुचेंशीश देई ले जाय ॥ 64 
प्रेम प्याला जो पियेशीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीश न दे सकेनाम प्रेम का लेय ॥ 65 
सुमिरन में मन लाइएजैसे नाद कुरंग ।
कहैं कबीर बिसरे नहींप्रान तजे तेहि संग ॥ 66 
सुमरित सुरत जगाय करमुख के कछु न बोल ।
बाहर का पट बन्द करअन्दर का पट खोल ॥ 67 
छीर रूप सतनाम हैनीर रूप व्यवहार ।
हंस रूप कोई साधु हैसत का छाननहार ॥ 68 
ज्यों तिल मांही तेल हैज्यों चकमक में आग ।
तेरा सांई तुझमेंबस जाग सके तो जाग ॥ 69 
जा करण जग ढ़ूँढ़ियासो तो घट ही मांहि ।
परदा दिया भरम काताते सूझे नाहिं ॥ 70 
जबही नाम हिरदे घराभया पाप का नाश ।
मानो चिंगरी आग कीपरी पुरानी घास ॥ 71 
नहीं शीतल है चन्द्रमाहिंम नहीं शीतल होय ।
कबीरा शीतल सन्त जननाम सनेही सोय ॥ 72 
आहार करे मन भावताइंदी किए स्वाद ।
नाक तलक पूरन भरेतो का कहिए प्रसाद ॥ 73 
जब लग नाता जगत कातब लग भक्ति न होय ।
नाता तोड़े हरि भजेभगत कहावें सोय ॥ 74 
जल ज्यों प्यारा माहरीलोभी प्यारा दाम ।
माता प्यारा बारकाभगति प्यारा नाम ॥ 75 

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दिल का मरहम ना मिलाजो मिला सो गर्जी ।
कह कबीर आसमान फटाक्योंकर सीवे दर्जी ॥ 76 
बानी से पह्चानियेसाम चोर की घात ।
अन्दर की करनी से सबनिकले मुँह कई बात ॥ 77 
जब लगि भगति सकाम हैतब लग निष्फल सेव ।
कह कबीर वह क्यों मिलेनिष्कामी तज देव ॥ 78 
फूटी आँख विवेक कीलखे ना सन्त असन्त ।
जाके संग दस-बीस हैंताको नाम महन्त ॥ 79 
दाया भाव ह्र्दय नहींज्ञान थके बेहद ।
ते नर नरक ही जायेंगेसुनि-सुनि साखी शब्द ॥ 80 
दाया कौन पर कीजियेका पर निर्दय होय ।
सांई के सब जीव हैकीरी कुंजर दोय ॥ 81 
जब मैं था तब गुरु नहींअब गुरु हैं मैं नाय ।
प्रेम गली अति साँकरीता मे दो न समाय ॥ 82 
छिन ही चढ़े छिन ही उतरेसो तो प्रेम न होय ।
अघट प्रेम पिंजरे बसेप्रेम कहावे सोय ॥ 83 
जहाँ काम तहाँ नाम नहिंजहाँ नाम नहिं वहाँ काम ।
दोनों कबहूँ नहिं मिलेरवि रजनी इक धाम ॥ 84 
कबीरा धीरज के धरेहाथी मन भर खाय ।
टूट एक के कारनेस्वान घरै घर जाय ॥ 85 
ऊँचे पानी न टिकेनीचे ही ठहराय ।
नीचा हो सो भरिए पिएऊँचा प्यासा जाय ॥ 86 
सबते लघुताई भलीलघुता ते सब होय ।
जौसे दूज का चन्द्रमाशीश नवे सब कोय ॥ 87 
संत ही में सत बांटईरोटी में ते टूक ।
कहे कबीर ता दास कोकबहूँ न आवे चूक ॥ 88 

मार्ग चलते जो गिराताकों नाहि दोष ।
यह कबिरा बैठा रहेतो सिर करड़े दोष ॥ 89 
जब ही नाम ह्रदय धरयोभयो पाप का नाश ।
मानो चिनगी अग्नि कीपरि पुरानी घास ॥ 90 
काया काठी काल घुनजतन-जतन सो खाय ।
काया वैध ईश बसमर्म न काहू पाय ॥ 91 
सुख सागर का शील हैकोई न पावे थाह ।
शब्द बिना साधु नहीद्रव्य बिना नहीं शाह ॥ 92 
बाहर क्या दिखलाएअनन्तर जपिए राम ।
कहा काज संसार सेतुझे धनी से काम ॥ 93 
फल कारण सेवा करेकरे न मन से काम ।
कहे कबीर सेवक नहींचहै चौगुना दाम ॥ 94 
तेरा साँई तुझमेंज्यों पहुपन में बास ।
कस्तूरी का हिरन ज्योंफिर-फिर ढ़ूँढ़त घास ॥ 95 
कथा-कीर्तन कुल विशेभवसागर की नाव ।
कहत कबीरा या जगत में नाहि और उपाव ॥ 96 
कबिरा यह तन जात हैसके तो ठौर लगा ।
कै सेवा कर साधु कीकै गोविंद गुन गा ॥ 97 
तन बोहत मन काग हैलक्ष योजन उड़ जाय ।
कबहु के धर्म अगम दयीकबहुं गगन समाय ॥ 98 
जहँ गाहक ता हूँ नहींजहाँ मैं गाहक नाँय ।
मूरख यह भरमत फिरेपकड़ शब्द की छाँय ॥ 99 

कहता तो बहुत मिलागहता मिला न कोय ।
सो कहता वह जान देजो नहिं गहता होय ॥ 100 

 

- कबीरदास
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